विभूतियाँ
Season–1शहीद भगत सिंह का अंतिम पत्र
मेरे सांसों की स्याही,
जीवन के अंतिम पन्ने पर है,
प्रस्ताव साथ में...
लिखने को तो शेष उमर है,
एक पत्र में क्षमा लिखूं,
सरकार दयालु पन्ने भर देगी,
कारा की ये रात अंधेरी,
तारों से रौशन कर देगी,
पर.... कहां अंधेरा ?
संग मेरे ज्वाला सी चिंगारी है,
ये सांस कहां मरती है ?
ये तो युग अवतारी है,
फिर भी...
एक पत्र लिख ही देता हूं,
शायद आज समय,
कुछ कह जाने की है,
जीवन के अंतिम पन्ने पर,
जीवन को दोहराने की है,
बस....एक विनय अधिकारी से है,
न सांस दया की प्यासी है,
मैं देश प्रेम में न्योछावर हूं,
पर मुझ पर दोषी फांसी है,
है चाह मेरी.. बन्दूकों की गोली,
मेरा शीना पार करे,
मैं बलिदानी रण को अर्पित,
ये धरती मेरा आधार बने।
🌿 Written by Rishabh Bhatt 🌿
✒️ Poet in Hindi | English | Urdu
💼 Engineer by profession, Author by passion
इन पंक्तियों के पीछे छिपी क्रांति ✍🏻
भगत सिंह और दया याचिका की सच्ची कहानी कई बार इतिहास की सबसे बड़ी क्रांतियां तलवारों से नहीं, बल्कि आखिरी क्षणों में लिए गए निर्णयों से जन्म लेती हैं। Bhagat Singh का जीवन भी ऐसा ही था।जब मैंने ये कविता लिखी, तब मेरे मन में सिर्फ एक दृश्य था — एक अंधेरी काल कोठरी… चारों ओर सन्नाटा… और बीच में बैठा एक ऐसा युवक, जिसे अपनी मृत्यु से डर नहीं, बल्कि इस बात की चिंता है कि उसके विचार आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचेंगे या नहीं।
ब्रिटिश सरकार चाहती थी कि भगत सिंह झुक जाएं। उन्हें कई बार समझाने की कोशिश हुई कि अगर वे दया याचिका लिख दें, माफी मांग लें, तो शायद उनकी सजा कम हो सकती है। अंग्रेज़ों को लगता था कि हर इंसान मौत के सामने टूट जाता है। लेकिन भगत सिंह सिर्फ एक व्यक्ति नहीं थे। वे एक विचार बन चुके थे।
इतिहास में उल्लेख मिलता है कि उन्होंने अपने लिए दया की भीख नहीं मांगी। बल्कि उन्होंने कहा कि उन्हें युद्धबंदी की तरह देखा जाए और फांसी देने के बजाय गोली मारी जाए। क्योंकि उनके लिए ये कोई अपराध नहीं था… ये देश के लिए लड़ी गई लड़ाई थी। यहीं से इस कविता की आत्मा जन्म लेती है।
एक पत्र में क्षमा लिखूं, सरकार दयालु पन्ने भर देगी…इन पंक्तियों में वही क्षण छिपा है, जहां एक इंसान चाहे तो अपना जीवन बचा सकता है, लेकिन वह अपने सिद्धांतों को बचाना चुनता है। कविता में जो “अंधेरी कारा” है, वो सिर्फ जेल नहीं है। वो उस समय का भय, दबाव और मृत्यु का साया है। लेकिन फिर भी कवि लिखता है —
पर… कहां अंधेरा? संग मेरे ज्वाला सी चिंगारी है…यही भगत सिंह की सबसे बड़ी शक्ति थी। उनके अंदर विचारों की ऐसी आग थी, जिसे कोई जेल, कोई फांसी और कोई साम्राज्य बुझा नहीं सकता था। इस कविता को लिखते समय मेरा उद्देश्य सिर्फ एक ऐतिहासिक घटना बताना नहीं था। मैं उस मानसिकता को महसूस करवाना चाहता था, जहां एक युवा अपनी आखिरी सांसों में भी राष्ट्र को अपने जीवन से ऊपर रखता है। भगत सिंह की कहानी हमें सिर्फ देशभक्ति नहीं सिखाती। वो सिखाती है कि विचारों की ताकत शरीर से कहीं बड़ी होती है। शायद इसलिए आज भी उनका नाम आते ही, इतिहास केवल पढ़ा नहीं जाता… महसूस होता है। ⚔️ •💬 अगर आपको यह कविता अच्छा लगा हो, तो नीचे कमेंट में अपनी राय जरूर बताइए। •📲 इसे अपने दोस्तों और परिवार के साथ भी शेयर कीजिए। •📚 ऐसी ही कविताएँ, कहानियाँ और ब्लॉग पढ़ने के लिए हमारी वेबसाइट से जुड़े रहिए। ✨ •🌸 आपके स्नेह के लिए धन्यवाद — Team RishNova
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