कभी–कभी ज़िंदगी हमें दो रास्तों पर खड़ा कर देती है। एक वो जो दिल चाहता है, और दूसरा वो जिसे हालात हम पर थोप देते हैं। ऐसा ही लम्हा तब आया जब मैं रामपुर स्टेशन पर था। सामने लाल कुँआ जाने वाली ट्रेन खड़ी थी — वही जगह, जहाँ मेरा दिल जाना चाहता था। मगर वक़्त मुझे कहीं और बुला रहा था। दिल और हालात के बीच खींचातानी इतनी बढ़ गई कि मैंने जेब से एक सिक्का निकाला। सोचा, जो नसीब में होगा, वही सामने आएगा।
सिक्का उछला, गिरा… और जवाब वही आया, जिसे मेरा दिल हरगिज़ नहीं चाहता था। उस पल ऐसा लगा जैसे किसी ने मेरी धड़कनों को मुठ्ठी में कस लिया हो। ट्रेन धीरे–धीरे सीटी बजाकर आगे बढ़ गई, और मैं वहीं प्लेटफ़ॉर्म पर ठिठक गया। नज़रें पटरियों पर टिकी थीं, लेकिन दिल जानता था कि उस ट्रेन को छोड़कर मैंने अपनी मोहब्बत से शायद कई सालों की दूरी चुन ली है।
मैं भारी क़दमों से स्टेशन की एक बेंच पर जा बैठा। जेब से डायरी निकाली, और हाथ अपने आप चलने लगे। लिखा —
“लाल कुँआ जाने वाली बस अभी ट्रेन छूटी।” यही लफ़्ज़ मेरे जज़्बातों का सहारा बन गए। जैसे इंसान जब अपनी मंज़िल खो देता है तो दिल को तसल्ली देने के लिए बहाना ढूँढ़ता है, उसी तरह ये लफ्ज़ मेरे लिए एक बहाना थीं।
उस दिन समझ आया कि हर सफ़र सिर्फ़ मंज़िल तक पहुँचने के लिए नहीं होता। कभी–कभी सफ़र हमें ये सिखाने के लिए भी होता है कि मोहब्बत हमेशा मिलना नहीं, बल्कि महसूस करना है। लाल कुआं की उस ट्रेन को छोड़ना मेरे लिए दर्द भरा था, मगर उसी ने मुझे ये लफ़्ज़ दिए —
“लाल कुँआ जाने वाली बस अभी ट्रेन छूटी।” शायद यही मेरी तसल्ली थी, कि जो पल मैंने खोया, वही मेरी लिखावट में हमेशा के लिए जी उठा। मोहब्बत मुझसे दूर सही, मगर मेरी क़लम में क़ायम रही।
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