विभूतियाँ
Season–1जी० एच० हार्डी के शब्द
तुम्हारे आराध्य अनन्त वो,
मेरा मैं ही आराध्य हूं,
संबंध न हमारे धर्म का,
पर तर्क संबंध का बाध्य हूं।
खोज मेरी मैं तुम्हे मानता हूं,
तुम स्वयं के निर्माण कर्ता हो,
सत्य यह भी मैं जानता हूं,
तुम सा न श्रेष्ठ जग में।
हर प्रमेय भी अधूरा है,
अधूरा गणित का हर फलन,
कुछ भी कहां पूरा है?
पर आज मिथ्या सा लग रहा,
पत्र ये मुझे है छल रहा,
कर रहा आघात हर पल,
जो आज था वो कल रहा।
🌿 Written by Rishabh Bhatt 🌿
✒️ Poet in Hindi | English | Urdu
💼 Engineer by profession, Author by passion
एक गणितज्ञ का शोक
इस कविता के पीछे की कल्पनाकुछ रिश्ते शब्दों से नहीं बनते, वे विचारों से बनते हैं और जब ऐसे रिश्ते टूटते हैं, तो दुःख केवल व्यक्ति के जाने का नहीं होता… एक युग के समाप्त हो जाने का होता है। यह कविता उसी कल्पना से जन्मी है। मैंने इस कविता में उस क्षण को महसूस करने की कोशिश की है, जब G. H. Hardy को Srinivasa Ramanujan के निधन का समाचार मिलता है।
कल्पना कीजिए… एक ऐसा व्यक्ति, जिसने गणित को जीवन दिया, जो संख्याओं में अनंत देखता था, जो हर प्रमेय में किसी अदृश्य सत्य की झलक खोज लेता था… अचानक समय उससे सब कुछ छीन ले। हार्डी और रामानुजन का संबंध केवल शिक्षक और छात्र का नहीं था। वह दो असाधारण मस्तिष्कों का मिलन था। दो बिल्कुल अलग संसार — एक ओर कठोर तर्क और पश्चिमी गणित, दूसरी ओर सहज अंतर्ज्ञान और अनंत पर विश्वास। और शायद इसी भाव से कविता शुरू होती है —
तुम्हारे आराध्य अनन्त वो, मेरा मैं ही आराध्य हूं…यहां दो विचारधाराएं दिखाई देती हैं। रामानुजन, जो अपने सूत्रों को कहीं दिव्य प्रेरणा से जोड़कर देखते थे और हार्डी, जो तर्क, प्रमाण और गणितीय संरचना में विश्वास रखते थे। धर्म अलग हो सकते हैं, सोच अलग हो सकती है, लेकिन सत्य की खोज दोनों को जोड़ देती है।
पर तर्क संबंध का बाध्य हूं…मेरे लिए यह पूरी कविता की सबसे गहरी पंक्तियों में से एक है। क्योंकि यहां संबंध भावना से नहीं, बौद्धिक सम्मान से जन्म लेता है। लेकिन कविता धीरे-धीरे शोक में बदलने लगती है।
हर प्रमेय भी अधूरा है, अधूरा गणित का हर फलन…जैसे रामानुजन के जाने के बाद केवल एक व्यक्ति नहीं गया, बल्कि गणित का एक अधूरा अध्याय पीछे छूट गया। इतिहास भी कहीं न कहीं यही कहता है। रामानुजन ने बहुत कम आयु में संसार छोड़ दिया, लेकिन अपने पीछे ऐसे सूत्र छोड़ गए, जिन्हें समझने में दुनिया को दशकों लग गए। और अंत की पंक्तियां —
पर आज मिथ्या सा लग रहा, पत्र ये मुझे है छल रहा…यहां मैंने हार्डी के उस मानसिक आघात को महसूस करने की कोशिश की है, जहां उन्हें शायद विश्वास ही नहीं हो रहा कि इतना असाधारण मस्तिष्क इतनी जल्दी मौन हो सकता है। यह कविता केवल मृत्यु का शोक नहीं है। यह उस रिक्तता का शोक है, जो किसी अद्भुत प्रतिभा के चले जाने के बाद पीछे रह जाती है। कवि ने यहां कल्पना की है कि शायद उस दिन हार्डी ने केवल एक मित्र नहीं खोया था… उन्होंने गणित के अनंत आकाश का सबसे चमकदार तारा खो दिया था। ∞ •💬 अगर आपको यह कविता अच्छा लगा हो, तो नीचे कमेंट में अपनी राय जरूर बताइए। •📲 इसे अपने दोस्तों और परिवार के साथ भी शेयर कीजिए। •📚 ऐसी ही कविताएँ, कहानियाँ और ब्लॉग पढ़ने के लिए हमारी वेबसाइट से जुड़े रहिए। ✨ •🌸 आपके स्नेह के लिए धन्यवाद — Team RishNova
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