विभूतियाँ
Season–1अधूरा समय
अधूरा सा समय ये आज है,
उस अनुपम अनन्त से मैं हूँ,
उसका न जाने क्या राज है।
स्वप्न मेरे हैं अंकों के आधार वो,
खेल सकता हूँ समय से मैं,
लिख सकता हूँ समय से पार जो।
साक्षी लिखा हूँ जिन सिद्धांत को,
साक्षी है संघर्ष अनंत आराध्य वो,
जीत सकता हूँ हर रहस्य प्रांत को।
सागर बनाकर हर सूत्र पी लूँ मैं,
अमरत्व का वरदान क्या है,
एक पल में भी वर्ष जी लूँ मैं।
पर अद्भुत समय का आघात है,
बनकर सुबह हर स्वप्न मेरे पास है,
फिर भी अंधेरा अधूरी सी रात है।
अधूरा सा समय ये आज है....
🌿 Written by Rishabh Bhatt 🌿
✒️ Poet in Hindi | English | Urdu
💼 Engineer by profession, Author by passion
इस कविता के पीछे का एहसास
प्रतिभा के शोर के पीछे छिपी खामोश रातों की कहानीएक दिन मैं रामानुजन के ऊपर बनी फिल्म The Man Who Kenw Infinity देख रहा था। कमरे में हल्की सी खामोशी थी, और सामने फिल्म चल रही थी, लेकिन कुछ देर बाद मैं केवल एक फिल्म नहीं देख रहा था… मैं उन्हें महसूस कर रहा था। मैं बार-बार Cambridge की उस ठंडी जगह की कल्पना कर रहा था। एक छोटा सा कमरा। टेबल पर बिखरे हुए कागज़। कुछ अधूरे सूत्र। और उनके बीच बैठा एक ऐसा इंसान, जिसका दिमाग अनंत में भटक रहा था… लेकिन दिल अपने घर में अटका हुआ था।
वो समय ऐसा था जब रामानुजन बहुत बीमार रहने लगे थे। शरीर धीरे-धीरे जवाब दे रहा था। पर मुझे सबसे ज़्यादा जो बात चुभी, वो उनकी बीमारी नहीं थी… वो था उनका अकेलापन। मैं सोचता रहा — कैसा लगता होगा, जब पूरी दुनिया आपकी प्रतिभा को पहचान रही हो, लेकिन जिस व्यक्ति की सबसे ज़्यादा ज़रूरत हो… वो आपके पास न हो। उनकी पत्नी भारत में थीं। और वो… Cambridge में अकेले। शायद उसी पल मेरे भीतर पहली पंक्ति आई —
अधूरा सा समय ये आज है…मुझे लगा, ये केवल एक आदमी की कहानी नहीं है। ये उस हर इंसान की कहानी है, जो बाहर से असाधारण दिखता है… लेकिन भीतर कहीं बहुत शांत होकर टूट रहा होता है। जब मैंने लिखा —
स्वप्न मेरे हैं अंकों के आधार वो…तब मेरे मन में रामानुजन की वही दुनिया चल रही थी। वो दुनिया जहाँ अंक सिर्फ गणित नहीं थे। वो उनके दोस्त थे। उनकी भाषा थे। उनका विश्वास थे। मुझे ऐसा लग रहा था जैसे वो समय से लड़ रहे हों। जैसे वो अपने शरीर से हार रहे हों… लेकिन अपने विचारों से अब भी अमर बने हुए हों। फिर एक जगह आकर मैं रुक गया।बहुत देर तक बस छत को देखता रहा। क्योंकि मुझे एहसास हुआ – कुछ लोग जीवन में सब समझ लेते हैं… बस अपना दर्द नहीं समझा पाते। और वहीं से निकली वो पंक्ति —
फिर भी अंधेरा अधूरी सी रात है…मेरे लिए ये अंधेरा मौत का नहीं था। ये उस खालीपन का अंधेरा था, जो इंसान को तब घेरता है जब उसके पास सब कुछ हो… सिवाय अपने लोगों के। इस कविता को लिखते समय मैं एक कवि की तरह नहीं सोच रहा था। मैं बस एक कहानी देख रहा था। एक ऐसा आदमी… जो कागज़ पर अनंत लिख सकता था, पर अपनी तन्हाई का हल नहीं निकाल पाया। •💬 अगर आपको यह कविता अच्छा लगा हो, तो नीचे कमेंट में अपनी राय जरूर बताइए। •📲 इसे अपने दोस्तों और परिवार के साथ भी शेयर कीजिए। •📚 ऐसी ही कविताएँ, कहानियाँ और ब्लॉग पढ़ने के लिए हमारी वेबसाइट से जुड़े रहिए। ✨ •🌸 आपके स्नेह के लिए धन्यवाद — Team RishNova
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