Chhatrapati Shivaji Maharaj ⚔️ – Rishabh Bhatt | Vibhutiyan

विभूतियाँ

Season–1

छत्रपति शिवाजी महाराज

कुछ धर्म रूढ़ियों के कहर से, जब सम्पूर्ण भारत संघर्ष कर रहा था, घुटनों के बल सभ्यता, स्वराष्ट्र के पन्नो में संघर्ष भर रहा था, हाथों की बेड़ियां पंखों को खोल, उड़ानों से दूर सी थी, पर्वत से तिनके-तिनके में, स्वाधीनता की सांसें मजबूर सी थी, तब अंधेरी पर्दे को खोल आंखो में– स्वराज्य की मसालें जलने लगी, गुरिल्ला नीति की छलांग, भारत में आसमान छूने लगी, संघर्ष! संस्कृति की धरोहर बनकर, रग-रग में दौड़ने लगी, समन्दर को मुठ्ठीयों में बांध, स्वराज्य हर बंधन को तोड़ने लगी, सूरज की चमक ने छत्रपति के माथें पर, मानवता का श्रृंगार किया, कौटिल्य की नीति और राणा के प्रताप ने, जब भारत में पुनर्वतार लिया। 🌿 Written by Rishabh Bhatt 🌿 ✒️ Poet in Hindi | English | Urdu 💼 Engineer by profession, Author by passion

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इन पंक्तियों में जलता स्वराज्य 🚩

एक युग, एक स्वराज्य, एक शिवाजी
इतिहास केवल तिथियों और युद्धों से नहीं बनता। कभी-कभी एक युग का दर्द, एक सभ्यता का अपमान और लोगों की भीतर दब चुकी स्वतंत्रता… मिलकर ऐसे व्यक्तित्व को जन्म देती है, जो केवल राजा नहीं रहता — प्रतीक बन जाता है। यह कविता उसी भावना से जन्मी है। उस समय की भावना, जब भारत केवल राजनीतिक संघर्ष नहीं झेल रहा था, बल्कि अपनी संस्कृति, स्वाभिमान और अस्तित्व को बचाने की लड़ाई भी लड़ रहा था। जब मैंने ये पंक्तियां लिखीं —
कुछ धर्म रूढ़ियों के कहर से, जब सम्पूर्ण भारत संघर्ष कर रहा था…
तब मेरे मन में केवल युद्ध का दृश्य नहीं था। मैं उस भारत को महसूस कर रहा था, जो भीतर से टूटा हुआ था। जहां लोगों के मन में भय था, जहां स्वाधीनता केवल शब्द बनती जा रही थी। और तभी इतिहास में उदय होता है Chhatrapati Shivaji Maharaj का। शिवाजी महाराज केवल एक योद्धा नहीं थे। वे उस समय की घुटती हुई चेतना के पुनर्जागरण थे। जब अधिकांश शक्तियां विशाल साम्राज्यों के सामने झुक चुकी थीं, तब उन्होंने पर्वतों, किलों और जंगलों को अपनी शक्ति बना लिया। उन्होंने युद्ध को केवल बल से नहीं, बुद्धि से लड़ा। यहीं से कविता में “गुरिल्ला नीति” का भाव आता है।
गुरिल्ला नीति की छलांग, भारत में आसमान छूने लगी…
यह केवल सैन्य रणनीति नहीं थी। यह उस सोच का प्रतीक थी, जहां सीमित संसाधनों के बावजूद आत्मसम्मान को जीवित रखा गया। कविता में बार-बार “स्वराज्य” शब्द आता है। क्योंकि शिवाजी महाराज के लिए स्वराज्य केवल राज्य प्राप्त करना नहीं था। वह लोगों को भय से मुक्त करना था। अपनी संस्कृति को सम्मान देना था। अपनी मिट्टी को अपना कहना था।
समन्दर को मुठ्ठीयों में बांध…
इन पंक्तियों में उनके अद्भुत साहस और दूरदर्शिता की झलक है। उन्होंने केवल पर्वतों तक स्वयं को सीमित नहीं रखा, बल्कि समुद्री शक्ति को भी समझा। एक ऐसे समय में, जब अधिकांश भारतीय शक्तियां समुद्र को युद्ध की दृष्टि से नहीं देखती थीं। और अंत की पंक्तियां —
कौटिल्य की नीति और राणा के प्रताप ने, जब भारत में पुनर्वतार लिया…
मेरे लिए ये केवल उपमा नहीं है। यह उस भावना का चित्रण है, जहां शिवाजी महाराज में भारत के प्राचीन शौर्य, नीति और स्वाभिमान का पुनर्जन्म दिखाई देता है। इस कविता को लिखते समय मेरा उद्देश्य केवल वीरता का वर्णन करना नहीं था। मैं उस चेतना को शब्द देना चाहता था, जिसने लोगों को यह विश्वास दिलाया कि स्वराज्य कोई स्वप्न नहीं… अधिकार है। ⚔️ •💬 अगर आपको यह कविता अच्छा लगा हो, तो नीचे कमेंट में अपनी राय जरूर बताइए। •📲 इसे अपने दोस्तों और परिवार के साथ भी शेयर कीजिए। •📚 ऐसी ही कविताएँ, कहानियाँ और ब्लॉग पढ़ने के लिए हमारी वेबसाइट से जुड़े रहिए। ✨ •🌸 आपके स्नेह के लिए धन्यवाद — Team RishNova
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