आशिकों की गली में
Season–3खूबसूरती और तुम 🫶🏻🌷
तुम्हारी हर तस्वीर पर,
मेरा भी हक है।
वो चाहे तुम्हारा पर्पल वाला लहंगा हो,
जिसकी डोरी वाली ब्लाउज़
तुम पे अच्छी ही नहीं, बेहतरीन लगती है।
तुम्हारे बाएं कंधे से निकला दुपट्टा,
कमर के दाहिने हिस्से को छूता हुआ,
जिसे बाॅ की मदद से तुमने ब्लाउज में पिन किया है।
तुम्हारे झुमके की डिजाइन का नाम मालूम नहीं,
मगर तुम्हें पाकर उस झुमके को नाम मिल गया है।
तुम्हारे बाएं हाथ में चैन वाली घड़ी,
जिसके थोड़े ऊपर तुमने काला धागा बांध रखा है,
और दाहिने हाथ में एक कँगन,
बसंत में खिले फूल सी तुम्हें हसीन लुक दे रही है।
जैसे बरसातों की खूबसूरती
बिना इन्द्रधनुष के पूरी नहीं होती,
वैसे ही, अगर तुम्हारे खुले बाल और
माथे की छोटी सी बिंदी को तस्वीर में जगह न मिले,
तो सबकुछ पतझड़ के समान है।
मुझे लगता है, कुदरत आईना देख रहा था,
जब उसने तुम्हें बनाया।
तभी तो उसने खुद से उतार,
सारी खूबसूरती तुममें रख दी।
ये खूबसूरत शब्द भी तुम्हारी तारीफ में छोटे लगते हैं,
क्योंकि हजारों खूबसूरत शब्द मिलकर,
अगर कोई एक शब्द बनता,
“तो वो हो तुम।”
🌿 Written by Rishabh Bhatt 🌿
✒️ Poet in Hindi | English | Urdu
💼 Engineer by profession, Author by passion
Author's Note
हर कविता के पीछे की छोटी-सी कहानीकभी-कभी कोई शख़्स आपके सामने बस कुछ पलों के लिए आता है, लेकिन उन कुछ पलों में इतना कुछ छोड़ जाता है कि बाद में उसके बारे में लिखने के लिए पूरी की पूरी नज़्म छोटी लगने लगती है।
एक रोज़ वो मेरे सामने आई।
Purple dress में।
मैंने उसे देखा और सच कहूँ तो उस वक़्त मेरे पास कहने के लिए कुछ था ही नहीं। बस देखता रहा। 👀
वो कितनी ख़ूबसूरत लग रही थी, यह शायद मैं आज भी ठीक से शब्दों में नहीं लिख सकता। उसकी ड्रेस, दुपट्टा, झुमके, हाथ की घड़ी, काला धागा, कंगन, खुले बाल और माथे की वो छोटी-सी बिंदी... नज़र एक जगह ठहरती ही नहीं थी।
बाद में लगा कि अगर उस दिन मेरे पास कोई तस्वीर होती, तो शायद मैं उसे देखकर उसकी हर छोटी-सी चीज़ लिख सकता। लेकिन तस्वीर मेरे पास नहीं थी। बस वो एक पल था और मेरी याद थी। शायद इसी वजह से ये कविता लिखी गई।
मैंने उसकी उस तस्वीर को शब्दों में बनाने की कोशिश की है, जो उस दिन मेरी आँखों ने अपने भीतर रख ली थी। ड्रेस से लेकर झुमके तक, दुपट्टे से लेकर बालों और बिंदी तक—जो कुछ मुझे याद रहा, उसे लिखता चला गया।
और सच कहूँ तो ये अल्फ़ाज़ बहुत सलीके से लिखे हुए नहीं हैं। ये उस शख़्स की ख़ूबसूरती को पकड़ने की मेरी टूटी-फूटी कोशिश है, जिसे देखकर उस दिन शायद पहली बार समझ आया कि किसी को ख़ूबसूरत कहना और किसी की ख़ूबसूरती को महसूस करना—दो अलग बातें हैं।
इसीलिए आख़िर में जाकर सारे रंग, सारे गहने, सारे शब्द पीछे छूट जाते हैं। क्योंकि जब कोई सच में बहुत ख़ूबसूरत लगे, तो उसकी तारीफ़ के लिए दुनिया के सारे ख़ूबसूरत शब्द भी कम पड़ जाते हैं। और तब दिल बस एक ही बात कहता है— हज़ारों ख़ूबसूरत शब्द मिलकर अगर कोई एक शब्द बनें, तो वो हो तुम।
नमस्कार, मैं Rishabh Bhatt। अगर कभी आपके सामने भी कोई ऐसा शख़्स आया हो, जिसे देखकर कुछ पल के लिए शब्दों ने आपका साथ छोड़ दिया हो, तो शायद आप इस एहसास को समझ पाएँगे।
नज़्म पढ़िए, अपनी कोई ऐसी याद हो तो Comment में मेरे साथ बाँटिए, और अगर किसी की ख़ूबसूरती आपको भी कभी शब्दों से बड़ी लगी हो, तो उसे यह नज़्म Share करना मत भूलिए। हर Friday RishNova पर एक नई Writing आपका इंतज़ार करती है। ❤️
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