उर्दू नज़्में
Season–2मेरे दिल में पनाह ❤️
जिस्म–ओ–जहां का अजीबो-गरीब घर है,
न जाने उसके साए की कितनी उमर है?
बेखौफ कत्ले–आम करती थी निगाहों से जो,
मौत का नहीं मुझे उस पर इल्जाम का डर है,
मेरे यादों में रहती है छोड़–छाड़ घर बार अपना,
मेरे पास ही आ कर रहे उससे बेहतर है,
लहू के कतरे–कतरे में बोया हूं जिसे,
क्या उसकी गिरेबान में भी मेरी गुजर है?
मोहब्बत की चारदीवारी में कैद न हो,
उसकी आजादी का कैसा बसर है?
दौड़ते होंगे मुसाफिर राह ए मंज़िल की ओर,
मंजिले–इश्क में मेरी ठहर है,
ये रंगों को सजाया है किसने तस्वीर में?
उसकी हकीकत के आगे लगते तर बितर हैं,
साहिल की तलाश में भटका भंवर में जो,
उस मांझी की नाव ही शायद जर्जर है,
वो जिसका होना ही कोई ख्वाब है,
उसके ख्वाबों का भला कैसा मंजर है?
मेरे दिल में पनाह है उन दिलासों की,
जिन्हें पूरी होती दिखाई देती उम्मीदों की सबर है।
किताब : कसमें भी दूं तो क्या तुझे?
🌿 Written by Rishabh Bhatt 🌿
✒️ Poet in Hindi | English | Urdu
💼 Engineer by profession, Author by passion
Author's Note
हर नज़्म के पीछे की छोटी-सी कहानीप्यारे साथियों,
इस Series में मैं हर नज़्म के साथ उससे जुड़ी कुछ बातें और अपनी यादें भी आपके साथ साझा कर रहा हूँ। यह सिलसिला मैंने 2026 से शुरू किया है। इससे पहले RishNova पर मेरी रचनाएँ सिर्फ़ Poetry के रूप में ही Publish होती थीं।
इसलिए मेरी कुछ पुरानी Poetries ऐसी हैं, जिनसे जुड़ा हर एहसास, हर लम्हा और आप लोगों का दिया प्यार आज भी याद है। लेकिन कुछ रचनाएँ ऐसी भी हैं, जिन्हें लिखते वक़्त मेरे ज़ेहन में क्या चल रहा था या उनके पीछे कौन-सी याद थी, वह अब मुझे ठीक से याद नहीं।
ऐसी रचनाओं के लिए मैंने AI की मदद से एक Situational Description तैयार किया है, ताकि आप उस नज़्म को एक Context के साथ पढ़ सकें। यह मेरी वास्तविक स्मृति या उस वक़्त की Exact कहानी होने का दावा नहीं है—इसे आप बस नज़्म को समझने का एक नज़रिया मान सकते हैं।
आप इसे पढ़ सकते हैं... और अगर सिर्फ़ Poetry पढ़ना चाहते हैं, तो इसे बेझिझक Ignore भी कर सकते हैं। ❤️
यह नज़्म एक ऐसे शख़्स के एहसास को सामने रखती है, जिसने किसी को अपने दिल में इतनी गहरी जगह दे दी है कि उसकी मौजूदगी अब सिर्फ़ यादों या ख़्वाबों तक सीमित नहीं रही। उसके लिए वह इंसान एक ऐसी पनाह बन गया है, जहाँ मोहब्बत, उम्मीद और सुकून एक साथ ठहरते हैं।
नज़्म में वह शख़्स सामने वाले की ख़ूबसूरती से आगे जाकर उसकी पूरी दुनिया को समझने की कोशिश करता है—उसकी आज़ादी, उसके ख़्वाब, उसकी ख़ामोशियाँ और उसके अपने रास्ते। वह उसे अपने क़रीब देखना चाहता है, लेकिन उसकी आज़ादी को भी उसी मोहब्बत का हिस्सा मानता है।
पूरी नज़्म में एक तरफ़ चाहत है, दूसरी तरफ़ कई सवाल। क्या जिस इंसान को उसने अपने दिल में इतनी जगह दी है, उसकी दुनिया में भी उसके लिए कोई जगह है? क्या उसके ख़्वाबों में भी उसकी कोई तस्वीर है?
“मेरे दिल में पनाह” इसी एहसास की कहानी है—जहाँ किसी को अपने दिल में जगह देने के लिए उसके साथ होना ज़रूरी नहीं, लेकिन उसकी मौजूदगी को महसूस करना ज़रूर काफ़ी है।
अगर “मेरे दिल में पनाह” ने आपके दिल में भी कोई एहसास जगाया हो, तो अपनी बात Comment में ज़रूर लिखिए। और अगर नज़्म आपको पसंद आई हो, तो इसे उस शख़्स तक Share कीजिए, जिसके लिए आपके दिल में ऐसी ही कोई पनाह है। ❤️
RishNova पर हर Friday एक नई Writing आपके लिए Publish होती है। नए अल्फ़ाज़, नई कहानियाँ और नए एहसासों के लिए जुड़े रहिए।
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