उर्दू नज़्में
Season–2इश्कबाज़ ❤️🩹
तुम पूछते हो ये इश्कबाज़ क्या है?
मेरी आंखों में देखो सूखेपन का राज़ क्या है?
मैं रोया हूं आंसुओं के सूख जाने तक,
खामोशियों से पूछता था आवाज़ क्या है?
सौ तलक निहारा उंगलियों ने आसमां को,
ये दिखा कि उससे रिश्ता आज क्या है?
जिसकी नुमाइश में लिख उठते थे नज्में शायर के,
इस खाली तख्त का, औदा औ ताज क्या है?
मैंने कब का माफ कर दिया दिल के रखवाले,
दिल ही का कत्ल करके नाराज़ क्या है?
बर्फ सी ठंडक मिली कलेजे को बेजान देख,
फिर भी पूछती है मरने वाले का मिज़ाज क्या है?
मौसम में फेरबदल देखी है कयामत ने सभी,
समझ न सका तब भी दगा खाने वाला, आगाज़ क्या है?
पढ़ी है मैने मिन्नते लाल आंखों से उस दिन,
कबूलनामों ने जब बेदखल किया कि नमाज़ क्या है?
तड़पती रह गई चटककर हर हड्डियां मेरी,
आंसुओं की कीमत समझता नहीं वो हमराज क्या है?
खूं से रंगे थे जिस्म सारे उस बेरहम के,
जब लाश ने पूछा, तू आदतों से बाज़ क्या है?
किताब : कसमें भी दूं तो क्या तुझे?
🌿 Written by Rishabh Bhatt 🌿
✒️ Poet in Hindi | English | Urdu
💼 Engineer by profession, Author by passion
Author's Note
हर नज़्म के पीछे की छोटी-सी कहानीप्यारे साथियों, सबसे पहले, दिल से शुक्रिया। ❤️
“उर्दू नज़्में – Season 2” की पहली नज़्म से लेकर आज की इस आख़िरी नज़्म तक मेरे साथ बने रहने के लिए। हर नज़्म को पढ़ने, महसूस करने और अपना प्यार देने के लिए मैं आपका शुक्रगुज़ार हूँ।
सच कहूँ तो यह Season ख़त्म करते हुए थोड़ा अजीब लग रहा है। ऐसा लग रहा है जैसे अभी सफ़र ख़त्म करने का मन ही नहीं है। इन नज़्मों के साथ सिर्फ़ मैंने नहीं लिखा, बल्कि हर बार आपसे भी एक रिश्ता बनता गया। आपकी प्रतिक्रियाएँ, आपकी पसंदीदा lines और कभी-कभी आपकी ख़ामोशी भी इस सफ़र का हिस्सा रही है। लेकिन हर Season को एक मुकाम तो देना ही पड़ता है। और इस Season की आख़िरी नज़्म है—“इश्क़बाज़”।
इसकी कहानी भी थोड़ी अचानक शुरू हुई थी।
एक रोज़ मैं अपने एक ख़ास दोस्त के साथ बैठा था। उस दिन उसने मुझे अपनी Love Story सुनाई—एक ऐसी कहानी, जिसकी मुझे कभी ज़रा भी भनक नहीं लगी थी, जबकि मैं उसके काफ़ी क़रीब रहा हूँ। तब तक उसका Breakup हो चुका था, कुछ Family Issues की वजह से। लेकिन उस दिन उसकी बातें सुनकर मैंने उसे पहली बार उस तरह देखा—जैसे उसके अंदर कोई पूरी दुनिया टूटकर बैठी हो।
बात ख़त्म होते-होते उसने हँसते हुए कहा—“तुम्हें मेरी Love Story पर कहानी लिखनी चाहिए, देख कितना फ़िल्मी हुआ सब कुछ।” मैंने भी हँसकर कह दिया, “हाँ, लिखूँगा।”
लेकिन घर लौटते वक़्त रास्ते में न जाने कहाँ से ये दो lines मेरे ज़ेहन में उतर आईं—
“तुम पूछते हो ये इश्क़बाज़ क्या है?
मेरी आँखों में देखो सूखेपन का राज़ क्या है?”
फिर एक और—
“मैं रोया हूँ आँसुओं के सूख जाने तक,
ख़ामोशियों से पूछता था आवाज़ क्या है?”
घर पहुँचकर मैंने उन lines को आगे बढ़ाना शुरू किया और देखते ही देखते “इश्क़बाज़” पूरी नज़्म बन गई।
आज भी ये शुरुआती lines मेरी Favourite हैं। शायद इसलिए कि इनमें सिर्फ़ उस दोस्त की कहानी नहीं, बल्कि हर उस इंसान का दर्द है जिसने कभी इतना रोया हो कि आँसू भी जवाब दे दें। जिसे अपनी ख़ामोशी में अपनी ही आवाज़ तलाशनी पड़ी हो। जिसे मोहब्बत ने तोड़ा भी हो और उसी मोहब्बत ने लिखना भी सिखाया हो। शायद आपको भी इनमें अपना कोई एहसास मिल जाए।
तो “इश्क़बाज़” के साथ यह Season भी यहीं ख़त्म होता है। लेकिन RishNova का सफ़र नहीं। यहाँ ऐसी ही अलग-अलग एहसासों से भरी बहुत-सी Poetry Series आपका इंतज़ार कर रही हैं। और अगर आप इन नज़्मों को एक किताब की शक्ल में अपने पास रखना चाहते हैं, तो मेरी किताब “कसमें भी दूँ तो क्या तुझे” ज़रूर पढ़िए। यह पूरी किताब इसी तरह की मोहब्बत, दर्द, ख़ामोशी और रिश्तों से भरी हुई है।
अगर “इश्क़बाज़” ने आपको कुछ महसूस कराया हो, तो अपनी बात Comment में ज़रूर बताइए और उस शख़्स के साथ Share कीजिए, जिसे यह नज़्म सुननी चाहिए। ❤️
और हाँ... Season ख़त्म हुआ है, RishNova नहीं। हर Friday एक नई Writing Publish होती है। तो अगली नज़्म, अगली कहानी और अगले एहसास के लिए RishNova के साथ बने रहिए। ❤️
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