उर्दू नज़्में
Season–2ज़िन्दगी 🌿
हक है मेरा तुझपे
फजीहत क्यूं करती है ज़िन्दगी?
मैं देखता हूं तुझे
तो औरों के आंखों की मरती है क्यूं ज़िन्दगी?
तुझमें कोई रम्ज़ है
जिसको भाती है ज़िन्दगी,
नुक्स ज़माने की लेकर
मेरे पास क्यूं आती है ज़िन्दगी?
ख्यालात इक ज़हन में,
है क्यूं डरी ज़िन्दगी?
जब मैं तेरा हूं
और तुम हो मेरी ज़िन्दगी,
हो गई इतनी जवां
कि इश्क़ से रवां लेती नहीं ज़िन्दगी,
मांगता हूं तुझे
फिर क्यूं मुझे देती नहीं ज़िन्दगी?
मुद्दत-ओ-शौक में
तुम-ही-तुम हो बसी ज़िन्दगी,
सोचता हूं मेरे हर ग़म की
तुम-ही-तुम हो खुशी ज़िन्दगी,
हैरतअंगेज ज़माने की कहानियों में
बड़ी मगरुर है ज़िन्दगी,
इतनी! कि आज मैं तुझसे
और तू मुझसे दूर है ज़िन्दगी।
किताब : कसमें भी दूं तो क्या तुझे?
🌿 Written by Rishabh Bhatt 🌿
✒️ Poet in Hindi | English | Urdu
💼 Engineer by profession, Author by passion
Author's Note
हर नज़्म के पीछे की छोटी-सी कहानी Hello प्यारे साथियों और Welcome Back! ❤️
सबसे पहले, "उर्दू नज़्में – Season 1" को इतना प्यार देने के लिए दिल से आपका शुक्रिया। आपने उन नज़्मों को सिर्फ़ पढ़ा नहीं, उन्हें महसूस भी किया। आपके Messages, Comments, Shares और दुआओं ने मुझे यक़ीन दिलाया कि अल्फ़ाज़ सच में दिलों तक अपना रास्ता बना लेते हैं।
और शायद यही वजह है कि... आज एक बार फिर "उर्दू नज़्में" आपके बीच लौट आई हैं। एक नए एहसास, नई कहानियों और नए Season के साथ।
हर Season की तरह, इस बार भी मेरी कोशिश यही रहेगी कि हर नज़्म सिर्फ़ पढ़ी न जाए, बल्कि कहीं-न-कहीं आपको आपकी अपनी कहानी भी याद दिला जाए। अगर किसी एक मिसरे में भी आपको अपना कोई लम्हा, कोई चेहरा, या कोई अधूरा एहसास मिल जाए... तो समझूँगा कि लिखना सफल हुआ।
इस नए सफ़र की पहली नज़्म है—"ज़िन्दगी"। मुझे हमेशा लगा है कि मोहब्बत और ज़िन्दगी, दोनों एक-दूसरे से अलग नहीं हैं। जिस दिन कोई इंसान दिल के बहुत क़रीब आ जाता है, उसी दिन से ज़िन्दगी का मतलब भी बदलने लगता है। उसकी मुस्कुराहट में अपनी ख़ुशी दिखने लगती है, उसकी उदासी अपना दर्द बन जाती है, और धीरे-धीरे ऐसा लगता है जैसे ज़िन्दगी अब किसी एहसास का नहीं, बल्कि उसी एक इंसान का दूसरा नाम हो।
यही सोच इस नज़्म की रूह है। यहाँ "ज़िन्दगी" सिर्फ़ ज़िन्दगी नहीं है। कभी वह एक महबूब है, कभी एक शिकायत, कभी एक उम्मीद, तो कभी वही सवाल... जिसका जवाब शायद मोहब्बत करने वाला हर इंसान ढूँढ़ता रहता है।
उम्मीद है, जैसे आपने पिछले Season की नज़्मों को अपने दिल में जगह दी, वैसे ही इस नए सफ़र को भी उतनी ही मोहब्बत देंगे।
तो आइए... एक बार फिर, अल्फ़ाज़ों के इस सफ़र पर साथ चलते हैं।
अगर ये नज़्म आपको थोड़ा भी connect कर पाया हो, तो नीचे comment करके अपनी बात ज़रूर बताइए। 💬 इसे अपने दोस्तों के साथ share भी कीजिए, शायद किसी को इसकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत हो। ❤️ और हाँ, हर Friday RishNova पर एक नया ब्लॉग आता है, तो अगला पढ़ना miss मत कीजिए! ✨
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