उर्दू नज़्में
Season–1आवारा 🥀
तुम्हारी शामें किसी और के नाम लिखी जा चुकी हैं,
जानता हूँ...
फिर भी मता-ए-ज़ां,
अपने हर अमरोज का फर्दा तुझे ही मानता हूँ,
किताबों ने बहुत कुछ कहा है करने को,
लेकिन हद कुछ कर न सकी,
बाकी रह गई एक शाम तुम्हारे नाम की,
जो तुझे बाजुओं में भर न सकी,
हबस परस्त निग़ाहों से आती हुई तेरी क़दमें,
एहसासों में मुझे झकझोर जाती है,
हवाओं में खड़ी ख़्वाबों की इमारत,
दरीचा खोलने को तुझे ही बुलाती है,
गेहुएं रंग में तितली के पंखों को छोड़,
रब का एहसानों-करम है तुझ पर,
झरने सी फूटती बूंदों सा झिलमिलाती अदाओं में,
कुदरत का असर है तुझ पर,
मेरी नूर-ए-जहां, तेरी खामोशियों से
धड़कनों की आहट भी गिराबार हुई जाती है,
नक्काशे सी तराशतीं होंठों को मोहब्बत की स्याहियां,
तुझ बिन बेकार हुई जाती हैं,
लहलहाती खेतों की फसलों का हर सबेरा,
तेरे साथ जा चुका है,
मगर तसल्ली तो है कि मेरी फलकों का जजीरा,
तेरी आंखों में झुका है,
किन्हीं ख़्वाब-ए-मरमरी की तरह,
अब इन गलियों में मारा–मारा फिरुं,
मगरूर सी इन शामों को लेकर,
मैं तेरे इश्क में आवारा फिरुं....💔
किताब : मेरा पहला जुनूं इश्क़ आखरी
🌿 Written by Rishabh Bhatt 🌿
✒️ Poet in Hindi | English | Urdu
💼 Engineer by profession, Author by passion
Author's Note
हर रचना के पीछे की छोटी-सी कहानी"आवारा" लिखने से बहुत पहले, मैं "आवारा" पढ़ चुका था।
इस नज़्म का शीर्षक मुझे मजाज़ लखनवी साहब की कालजयी नज़्म "आवारा" से मिला। सच कहूँ, उर्दू अदब में उनकी वह पेशकश एक समंदर की तरह है। उसके सामने मेरी यह नज़्म एक बूंद से ज़्यादा कुछ भी नहीं। और शायद होना भी नहीं चाहिए। मेरा मक़सद कभी ख़ुद को उन महान शायरों के बराबर रखना नहीं रहा, बल्कि उनसे सीखना, उनकी रचनाओं से मोहब्बत करना और हर नई नज़्म के साथ ख़ुद को थोड़ा बेहतर बनाना रहा है।
इस नज़्म की रूह को आकार देने में मनोज मुंतशिर शुक्ला सर की कई कविताओं का भी गहरा असर है। ख़ासकर "मैं तुझसे प्यार नहीं करता", "मेरा प्यार एकतरफ़ा", और उनकी ऐसी कई रचनाएँ, जिन्होंने मुझे यह समझाया कि मोहब्बत सिर्फ़ हासिल करने का नाम नहीं, बल्कि उसे ख़ामोशी से महसूस करने का हुनर भी है।
"आवारा" मेरे लिए किसी आशिक़ की कहानी नहीं है। यह उस दिल की आवाज़ है, जिसे पहले ही मालूम है कि उसकी मंज़िल कहीं और है... फिर भी वह उसी रास्ते पर चलता रहता है।
हम जानते हैं कि सामने वाला किसी और की दुनिया का हिस्सा है। फिर भी न जाने क्यों, हमारी हर सुबह उसी से शुरू होती है और हर रात उसी पर ख़त्म। हम कोई शिकायत नहीं करते, कोई हक़ नहीं जताते... बस ख़ामोशी से उसकी ख़ुशियों की दुआ करते रहते हैं।
शायद बाहर से देखने पर यह पागलपन लगे। लेकिन जिसने कभी सच्ची मोहब्बत की हो, वह जानता है कि दिल को समझाना सबसे मुश्किल काम होता है। यही वजह है इस नज़्म का आख़िरी मिसरा मेरे दिल के सबसे क़रीब है—
"मैं तेरे इश्क़ में आवारा फिरूँ..."
क्योंकि कभी-कभी मोहब्बत की सबसे सच्ची मंज़िल, किसी को पा लेना नहीं होती... बल्कि उसकी यादों में मुस्कुराते हुए भटकते रहना भी होती है।
अगर पढ़ते-पढ़ते कहीं आपको अपनी कहानी दिखी हो, तो comment करके हमें ज़रूर बताइए। 💙 इस ब्लॉग को share भी कीजिए, क्योंकि कुछ एहसास अकेले नहीं, साथ बाँटने के लिए होते हैं। 🌸 हर Friday RishNova पर एक नई कहानी, नई कविता या नया एहसास आपका इंतज़ार करता है। जुड़े रहिए। ✨
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