उर्दू नज़्में
Season–2नशा-ए-जिस्म ❤️🔥
मेरे जवां रात की तूं खोई हुई परछाईं है,
जिसे बाहों में मसरूफ कर
नींद रातों में लाई है,
तेरे बदन की गर्माहट
मेरे बदन को छूके, हिलोरें लेती
लहरों में गिरते बूंद सी
तूं खुद को जैसे मेरे ऊपर बिखेर देती,
ये इश्क़बाजी की रात
इस जवां रात की गवाही है,
जवानी में जवां शाम को डुबाती
जैसे एक राह पे दो जवां राही हैं,
जैसे गुलाब की महक़
तन-बदन में घुलती, इठलाती है,
जुनूने-इश्क यूं ही तेरे छुअन पे
हर पेशानी तुझपे लुटाती है,
तेरी नरम अदा, गरम जिस्म और
लफ्ज़ों में शक्करी मिठास,
बूंद बूंद पी जाती है निग़ाहों की दरिया
आते ही तेरे पास,
नाखूनीं उंगलियों को होंठों से लगाती
तेरी इस अदा को रेशा रेशा झांकता,
मदहोशी की इस रात में
मदहोशी ही पीने के लिए,
दिल हवाओं से भी तेज भागता,
नशा-ए-जिस्म, हर नशे को मार करके,
हमरूह को रूहों में मिला
कम्बख़त जिस्म वाला प्यार करके,
हर रोज़ मसरुफ़ होना चाहती है ये मरहूम समां,
बाहों में बेशर्मी की हदों को पार करती हुई
सारी उम्र जवां...।
किताब : मैं उसको ढूंढूंगा अब कहां?
🌿 Written by Rishabh Bhatt 🌿
✒️ Poet in Hindi | English | Urdu
💼 Engineer by profession, Author by passion
Author's Note
हर नज़्म के पीछे की छोटी-सी कहानीआज की Generation में Lust कोई अनजानी चीज़ नहीं रही। अक्सर मोहब्बत बाद में होती है, Attraction पहले। कभी किसी की Smile, कभी उसकी Eyes, कभी उसका Style... और कभी सिर्फ़ उसका जिस्म ही हमें अपनी तरफ़ खींच लेता है। शायद मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ था। पहले एक अजीब-सा Attraction हुआ... और फिर वही धीरे-धीरे एक ऐसी मोहब्बत में बदल गया, जिसमें होश से ज़्यादा पागलपन था।
वो मोहब्बत, जो शायद हमारे Indian Culture की नज़रों में हमेशा सहज नहीं मानी जाती। जो Kabir Singh की दीवानगी में दिखती है, Titanic में Jack और Rose की ख़ामोश नज़दीकियों में महसूस होती है। जहाँ कुछ लम्हों के लिए दुनिया ग़ायब हो जाती है, और बस दो लोग रह जाते हैं... और उनके बीच का एहसास।
फिर भी, मैं इतना ज़रूर कहना चाहूँगा कि मेरा देश, उसकी संस्कृति और उसके संस्कार मेरे लिए हमेशा सम्मान के योग्य रहे हैं। ये नज़्म किसी सोच या जीवनशैली का समर्थन नहीं करती, बल्कि सिर्फ़ एक इंसानी एहसास को उसके सबसे सच्चे रूप में समझने की कोशिश है। आख़िर जज़्बातों की कोई सरहद नहीं होती, लेकिन उन्हें जीने का अपना-अपना तरीक़ा ज़रूर होता है।
"नशा-ए-जिस्म" सिर्फ़ जिस्म की बात नहीं करती। ये उस पल की बात करती है, जब दो लोग एक-दूसरे की मौजूदगी में अपने सारे मुखौटे उतार देते हैं।
इस नज़्म को लिखते हुए मेरे ज़ेहन में बार-बार Titanic का वो दृश्य आता रहा, जहाँ Jack Dawson, Rose DeWitt Bukater की Painting बना रहा होता है। वहाँ जिस्म मौजूद है, लेकिन नज़र में हवस नहीं... सिर्फ़ मोहब्बत, सम्मान और एक कलाकार का समर्पण है। यही एहसास इस नज़्म की रूह है। अगर इसे पढ़ते हुए आपको सिर्फ़ जिस्म दिखाई दे, तो शायद मैं लिख नहीं पाया। लेकिन अगर आपको उस जिस्म के पीछे छिपा भरोसा, समर्पण, पागलपन और बेइंतिहा मोहब्बत महसूस हो जाए... तो समझूंगा, "नशा-ए-जिस्म" अपने असली मायने तक पहुँच गई।
अगर इस नज़्म में आपको अपना कोई एहसास, कोई ख़याल या कोई ख़ामोश शाम मिल जाए, तो अपनी बात Comment में ज़रूर लिखिए। और अगर आपको लगे कि यह नज़्म किसी अपने तक पहुँचनी चाहिए, तो उसे Share करना मत भूलिए। ❤️
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