Nambi : The Rocketry 🚀 – Rishabh Bhatt | Vibhutiyan

विभूतियाँ

Season–1

नम्बी: द राॅकेट्री

मेरा कसूर बस इतना था, कि मैंने मशीनों से प्यार किया, एक सपना हर हद को पार कर मेरे सीने में, इस कदर आ थमका, कि देशभक्ति के इस जूनून ने मुझे लाचार कर दिया। मेरी सुनता भी कौन? मैंने तारों को ही सब कुछ माना था, और जब शरीर को चार डंडे और लोगों की चार गालियां सुनने को मिलीं, तब पता चला... अपना एक परिवार भी है। मेरा पागलपन विज्ञान के हर पन्ने पर एक इतिहास लिखना चाहता था, ख्वाबों के चाँद को मुठ्ठियों में, और मंगल तक उड़ान चाहता था। सब कुछ वैसा ही हुआ... लेकिन इसकी कीमत मेरे परिवार को चुकानी पड़ी। जेल की हवाओं ने मुझे दोहरी ताक़त दी, और लोगों ने... कुछ कह नहीं सकता। मेरा एक और परिवार था, जिसने मेरे हर पागलपन में अपना जुनून पूरी ईमानदारी से दिया, उनके बिना मैं हर कदम पर अधूरा था। मगर दुःख है कि न्यायालय में सही साबित होने के बाद भी, वो सच आज भी अधूरा है। शायद... आपके प्रायश्चित मुझे एक नई पहचान दें, लेकिन... मैं कभी माफ़ नहीं कर सकता। 🌿 Written by Rishabh Bhatt 🌿 ✒️ Poet in Hindi | English | Urdu 💼 Engineer by profession, Author by passion

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इस कविता के पीछे का भाव

विज्ञान, विश्वास और विश्वासघात
कुछ लोग अपने जीवन में केवल नौकरी नहीं करते। वे अपने सपनों को जीते हैं। इतना गहराई से जीते हैं कि धीरे-धीरे उनका पूरा अस्तित्व उसी सपने का हिस्सा बन जाता है। यह कविता उसी भाव से जन्मी है और Nambi Narayanan के जीवन से प्रेरित है। एक ऐसा वैज्ञानिक, जिसने भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम को आगे बढ़ाने के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया। उनके लिए रॉकेट केवल मशीनें नहीं थे। वे भारत के भविष्य की उड़ान थे।
मेरा कसूर बस इतना था, कि मैंने मशीनों से प्यार किया…
इन पंक्तियों में वही दर्द छिपा है। जब कोई व्यक्ति अपने काम को केवल पेशा नहीं, बल्कि जुनून बना लेता है। Indian Space Research Organisation के शुरुआती वर्षों में भारत सीमित संसाधनों के बावजूद अंतरिक्ष विज्ञान में बड़ी छलांग लगाने की कोशिश कर रहा था। और ऐसे समय में नंबी नारायणन जैसे वैज्ञानिकों ने अपने सपनों से उस यात्रा को दिशा दी। लेकिन फिर आया वह दौर, जिसने केवल एक वैज्ञानिक नहीं, एक पूरे परिवार को तोड़ दिया। उन पर जासूसी के आरोप लगे। गिरफ्तारी हुई, पूछताछ हुई, अपमान हुआ। और शायद सबसे बड़ा दर्द यह था कि जिस व्यक्ति ने अपना जीवन देश को दिया, उसे अपने ही देश में खुद को निर्दोष साबित करना पड़ा। कविता की ये पंक्तियां —
तब पता चला... अपना एक परिवार भी है…
मेरे लिए बेहद व्यक्तिगत भाव रखती हैं। क्योंकि जब कोई व्यक्ति अपने लक्ष्य में पूरी तरह डूब जाता है, तब कई बार वह भूल जाता है कि उसके सपनों की कीमत उसके अपने लोग भी चुका रहे होते हैं। इस कविता में विज्ञान केवल तकनीक नहीं है। यह एक जुनून है। एक ऐसा जुनून, जो इंसान को तारों तक पहुंचाना चाहता है।
ख्वाबों के चाँद को मुठ्ठियों में, और मंगल तक उड़ान चाहता था…
लेकिन कविता यहीं रुकती नहीं। वह उस कटु सत्य तक जाती है, जहां न्याय मिलने के बाद भी कुछ घाव कभी पूरी तरह नहीं भरते। सालों बाद अदालत ने उन्हें निर्दोष माना। सम्मान वापस मिला। लेकिन जो समय, अपमान और मानसिक पीड़ा छिन चुकी थी… वह कभी लौट नहीं सकती।
शायद... आपके प्रायश्चित मुझे एक नई पहचान दें, लेकिन... मैं कभी माफ़ नहीं कर सकता।
यही इस कविता का सबसे भारी भाव है। यह क्रोध नहीं है। यह उस टूटन की आवाज है, जिसे केवल वही समझ सकता है जिसने अपने ही सपनों की कीमत अपने जीवन से चुकाई हो। इस कविता को लिखते समय मेरा उद्देश्य केवल एक घटना बताना नहीं था। मैं उस वैज्ञानिक की आत्मा को महसूस करवाना चाहता था, जो रॉकेट बनाते-बनाते स्वयं भीतर से टूट गया… लेकिन फिर भी अपने सपनों से प्रेम करना नहीं छोड़ा। 🚀 •💬 अगर आपको यह कविता अच्छा लगा हो, तो नीचे कमेंट में अपनी राय जरूर बताइए। •📲 इसे अपने दोस्तों और परिवार के साथ भी शेयर कीजिए। •📚 ऐसी ही कविताएँ, कहानियाँ और ब्लॉग पढ़ने के लिए हमारी वेबसाइट से जुड़े रहिए। ✨ •🌸 आपके स्नेह के लिए धन्यवाद — Team RishNova
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