उर्दू नज़्में
Season–2मेरे चांद को जमी की जरूरत है 🌙
इन आँखों को नमी की जरूरत है,
मेरे चांद को जमी की जरूरत है,
कल एक सबब बनके आई थी,
मौजों की रवानी से दिल टकराई थी,
मेरी रूहानी इख़लास के कसीदे,
बगैर उसके पल–दो–पल न बीतें,
फिर अचानक से सुनसान सा हुआ मैं,
किन्हीं रुसवाइयों के जहान सा हुआ मैं,
उसने अकेला छोड़ा तो बात समझ आई,
आज हमको हमीं की जरूरत है,
मेरे चांद को जमी की जरूरत है।
आजिज ज़िंदगी पे एहसान कर,
तीरगी का मुझपे यूं न इम्तिहान कर,
जुस्तजू कर तेरी हारा हूं मैं,
ज़दा इस जिस्म का आखरी सहारा हूं मैं,
नबी ओ चाहतों के फकत जागीर दे मुझको,
मैं उसको ढूंढ लूँ जिससे कोई तस्वीर दे मुझको,
जावेदां रिश्त–ए–जां की लिखी कहानी में,
हमेशा इन दर्द के कमी की जरूरत है,
मेरे चांद को जमी की जरूरत है।
किताब : मेरा पहला जुनूं इश्क़ आखरी
🌿 Written by Rishabh Bhatt 🌿
✒️ Poet in Hindi | English | Urdu
💼 Engineer by profession, Author by passion
Author's Note
हर नज़्म के पीछे की छोटी-सी कहानीप्यारे साथियों,
क्या आपके साथ भी कभी ऐसा हुआ है कि प्यार में पड़ने के बाद आप हक़ीक़त जानते हुए भी अपने ख़यालों की दुनिया में जीने लगे हों? आपको पता हो कि ज़िंदगी जैसी दिख रही है, वैसी ही है... फिर भी दिल सिर्फ़ उसी इंसान को सच मानकर बाकी सब कुछ भूल जाए।
शायद प्यार का असर ही कुछ ऐसा होता है। जब किसी से मोहब्बत होती है, तो हमारी नज़र के सामने पूरी दुनिया नहीं रहती—बस वही एक शख़्स रहता है। हम अपनी ज़िंदगी की हक़ीक़त की ज़मीन से उठकर ख़यालों के आसमान में उड़ने लगते हैं। वहाँ सब कुछ वैसा होता है, जैसा हम चाहते हैं। लेकिन फिर जब वही इंसान अचानक हमारी दुनिया से चला जाता है, तो एहसास होता है कि जिस आसमान में हम इतने वक़्त से उड़ रहे थे, उसके नीचे हमारी ज़मीन ही नहीं रही।
और शायद उसी वक़्त किसी की सबसे ज़्यादा ज़रूरत होती है। कोई ऐसा, जो हमें बचाने की कोशिश न करे... बस हमारी बात सुने। हमारी ख़ामोशी सुने, हमारी उलझन सुने और उस वक़्त हमारे पास बैठा रहे, जब हमें ख़ुद समझ न आ रहा हो कि हम किस चीज़ को तलाश रहे हैं।
“मेरे चाँद को ज़मी की ज़रूरत है” इसी एहसास से निकली नज़्म है। इसमें एक ऐसे दिल की कहानी है, जिसने मोहब्बत में आसमान तो पा लिया, मगर उस आसमान के नीचे खड़े रहने के लिए ज़मीन खो दी।
अगर आप मुझसे इस नज़्म की मेरी Favourite Lines पूछें, तो मैं शायद इन्हीं lines को चुनूँगा—
आजिज़ ज़िंदगी पे एहसान कर, तीरगी का मुझपे यूँ न इम्तिहान कर, जुस्तजू कर तेरी हारा हूँ मैं, ज़दा इस जिस्म का आख़िरी सहारा हूँ मैं, नबी-ओ-चाहतों के फ़क़त जागीर दे मुझको, मैं उसको ढूँढ लूँ जिससे कोई तस्वीर दे मुझको।इन lines में मुझे सबसे ज़्यादा जो चीज़ छूती है, वो है सहारे की तलाश। यहाँ दिल किसी बड़ी ख़ुशी की माँग नहीं कर रहा। वो बस इतना चाहता है कि उसकी तलाश को कोई मंज़िल मिल जाए, उसके अँधेरे में कोई तस्वीर उभर आए और उसे फिर से किसी ऐसी चीज़ पर यक़ीन हो सके, जिसे पकड़कर वह ख़ुद को संभाल पाए। शायद मोहब्बत के बाद सबसे मुश्किल काम यही होता है—अपने अंदर की बिखरी हुई चीज़ों को फिर से समेटना। अगर “मेरे चाँद को ज़मी की ज़रूरत है” में आपको अपना कोई एहसास, कोई ख़याल या कोई ख़ामोश शाम मिल जाए, तो अपनी बात Comment में ज़रूर लिखिए। और अगर आपको लगे कि यह नज़्म किसी अपने तक पहुँचनी चाहिए, तो उसे Share करना मत भूलिए। ❤️ हर Friday RishNova पर एक नई Writing Publish होती है। तो नई नज़्मों, नई कहानियों और नए एहसासों के लिए RishNova के साथ बने रहिए।
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