Sandhi Ya Sangraam 📜 ⚔️ – Rishabh Bhatt | Sindhpati Dahir : 712 AD

सिंधपति दाहिर : 712 ई॰

तीसरी स्मृति

संधि या संग्राम

जय हो! जय हो! उस वीर सुयश, तेज प्रकाश अनल की, जिसकी शोभा में अंकित सूर्य, चन्द्र, दिग्गज नभ तल की, जिसके विराट हृदय की प्रतिभा से, उज्ज्वल वसुधा नित होती है, साधु! साधु! गूंज गगन में, कुसुमित जन आनंद पिरोती है, जय हो! उस ब्रम्ह महाप्रभु की, जिनके आभूषण हों त्याग, जय हो! उस क्षत्रिय महाधर्म की, जिसके भुज भुज में हो पौरुष की आग, जय हो! उस कर्मनिष्ठ जन के, गौरव की प्रतिभा को, जिससे आलोकित बन्धुत्व धरा पर, जय हो! उस दीप प्रभा को। सो पाठक आज तुम्हें, वो इतिहास उजागर समझाता हूं, सिंध क्षेत्र के उस महासमर की, गाथा तुम्हें सुनाता हूं, सुनो धैर्य से उस धीर पुरुष को, उसके पौरुष को, बल को, सत्कर्म सुनो उस ब्रह्मराज की, विस्तृत भारत-भू के संबल को, वो दानी था कि राधेय स्वयं, उसके ललाट पर विद्यमान थे, वो भोले का डमरू था, जिससे कम्पित भू, कण-कण, आसमान थे, वो प्रेम भरा तो ऐसा, कि निठुराई मधुबन की हो, वैराग्य कुसुम का श्रृंगार धरे, मानो मंदिर का एक पुजारी हो, पग स्पंदन में ज्यों ऊषा की, किरणें सूरज को छोड़ें, मानो घनतम तिमिर चीर के, छोड़ दिए हों अपने घोड़े, हाथों में वो भाल लिए, दम्पत्ति स्वरुप विकराल लिए, टंकारों से रण गूंज उठे, कर में नभ-पाताल लिए, वो चलता था तो पदचापें– चल उठती थीं घर-घर से, छूने को पदचिन्ह पुजारी की, नगर-नगर से, डगर-डगर से, सिंधपति दाहिर की संज्ञा ले, पुरखों को गर्वित करता था, वंशज वो चच महावंश का, कुल की मर्यादा को धरता था। सो एक रोज विधि ने, रची गजब की पहनाई, एक संदेशा अरब देश से, चल राजन के गृह को आई, राजन ने भी सत्कार किया, विश्राम हेतु आधार दिया, किंचित मन में अकुलाहट ले, एक प्रश्न दरबार किया, बोले दरबारी सब मिलकर, क्या दृश्य लिए तुम आए इधर? हे दूत कहो! क्या अरबों में, मैत्री के भाव आये निखर? क्या गत वर्षों का पछतावा है? या अल्लाफी पर दावा है? क्या सुख वैभव के भाव जगे? या रण का ही पहनावा है? क्या सूदूर पहुंच कोई राग गई? या प्रखर ताप की आग नई? क्या संगर का प्रसाद जगा? या उर में बस अनुराग गई? क्या कारण है कि पश्चिम में, पूरब के फिर सौंदर्य सुहाएं? सुनने को धावक की बातें, मौन रूप दरबारी सब धाए। बोला चर निश्चय ही– यह संबंधों की है बात नई, कुछ शर्तें हैं, कुछ सौगातें भी, जो रात गई सो बात गई, सीधा मुख्य विषय पर आता हूँ, सागर का दृश्य दिखाता हूँ, सुरमा-काजल-लाली-लश्कर, मधु मैरेयक भी गिनवाता हूँ, ताज-तिजोरी हीरा-मोती, कुंतल-भालें असि व ढालें, सिक्के-माणिक-पारस-पत्थर, स्वर्ण-रजत आभूषण मालें, शाही कण-कण, रत्न आभूषण, सौंदर्य सुहाए सौ बालाएं, सौ-सौ सम्मुख स्वर अभियंता, गूंजें-गाजे-बाजे-गाएं, सौ वस्त्र रेशमी, सौ नवनीत–सदृश कालीन रेशमी, सौ सिंहासन को सज्जित प्रतिमाएं, सौ सुन्दरियों की सौंदर्य रेशमी, सौ व्यापारी के दल की भरपाई, लंका से सागर को आई, एक-एक का कर्ज तुम्हें है, ऋण तुम पर है पाई-पाई, तेरे ही सागर की सीमा में, एक लुटेरों का बेड़ा लूटा, धन-दौलत की सब खान ठही, जर्जर बस कश्ती ही छूटा, टूटा-फूटा सब कुछ छोड़ो, संबंधों में न कोई बाधा हो, रण गर्जन की है प्यास नहीं, पर सिंध मुझे यह आधा दो, यदि मानो तो सौगातें दूं, अरबी मधु में रंग रातें दूं, रंग-बिरंगी पंखुड़ी में, झिलमिल झिलमिल बरसातें दूं, झिझको यदि इनसे तो तलवार उठाऊं, रण गर्जन से ही प्यास बुझाऊं, रक्त स्नान करूं केसरिया से, कण-कण को शोणितमय कर जाऊं, क्षण है! सोंच-विचार करो तुम, संधि-सुखद स्वीकार करो तुम, आधे सिंध पे अरबी सेना, आधे पर अधिकार करो तुम। किताब – सिंधपति दाहिर : 712 AD 🌿 Written by Rishabh Bhatt 🌿 ✒️ Poet in Hindi | English | Urdu 💼 Engineer by profession, Author by passion

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Echoes of 712 AD: The tragic hero of Sindh who stood against the storm.

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प्रस्तुत है तीसरी स्मृति

आर्यत्व के आदर्श : सम्राट दाहिर ☀️
नमस्कार प्रिय पाठकों! RishNova परिवार की ओर से आप सभी का इस ऐतिहासिक काव्य–श्रृंखला में स्वागत है। अपने अभी तक की स्मृतियों को जो प्यार दिया उसे लिए हम आपके आभारी हैं। आज प्रस्तुत है तीसरी स्मृति– वेद कहता है – ‘मनुर्भव’, अर्थात् मनुष्य बनो (ऋ॰ 10.53.6)। परन्तु मनुष्य कैसे बना जा सकता है? इसी उद्देश्य से वेदों की रचना हुई। महाराज मनु भी कहते हैं – ‘वेदोऽखिलो धर्ममूलम्’, अर्थात् वेद ही मनुष्य के समस्त धर्मों और कर्तव्यों का मूल आधार हैं (मनु॰ 2/6)। इन धर्मों को धारण करने के लिए मनुष्य में दस लक्षणों का होना आवश्यक बताया गया है (मनु॰ 6/91) – धैर्य, क्षमा, दम (मन पर नियंत्रण), अस्तेय (चोरी न करना), शौच, इन्द्रिय-निग्रह (इन्द्रियों को सदैव धर्माचरण में लगाना), धी (सद्कर्मों से बुद्धि का विकास), विद्या, सत्य और अक्रोध। जिसके भीतर ये दस गुण विद्यमान हों, वही आर्य है, वही हिंदू है और वही सच्चे अर्थों में मनुष्य है। संभवतः किसी धर्म का इससे अधिक स्पष्ट चित्रण नहीं हो सकता। इन्हीं धर्मों को अपने जीवन में धारण करने वाले थे सम्राट दाहिर और उनकी प्रजा। यही कारण था कि सिंध परिषद् के जिस शासन की नींव राजा चच ने रखी और जिसे राजा चन्द्र ने विस्तार दिया, उसे स्थिरता, सामर्थ्य और अखंडता प्रदान करने का कार्य सम्राट दाहिर ने किया। उन्होंने न केवल अपने धर्म और कर्तव्यों का निर्वहन अत्यंत निष्ठा के साथ किया, बल्कि अपने पूर्वजों के नाम को भी नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया। वे जितना सम्मान हिंदुओं को देते थे, उतना ही आदर बौद्धों तथा अन्य पंथों के अनुयायियों को भी प्राप्त था। व्यापार अपने उत्कर्ष पर था और सिंध समृद्धि के नए आयाम स्थापित कर रहा था। कहा जाता है कि जब भी महाराज दाहिर शिव आराधना के लिए अपने महल से मंदिर की ओर निकलते, तो उनकी प्रजा उनके पदचिह्नों को अपने मस्तक से लगाती थी। राजा और प्रजा के मध्य ऐसा स्नेह और विश्वास दुर्लभ था। महाराज दाहिर के संरक्षण में सिंध भारत की ऐसी सुदृढ़ ढाल बन चुका था, जिसे भेद पाना किसी भी आक्रमणकारी के लिए सरल नहीं था। यही बात अरबों को भीतर ही भीतर विचलित करती थी। वे निरंतर किसी अवसर की प्रतीक्षा में रहते, किन्तु प्रत्येक बार उन्हें सिंध से केवल निराशा ही प्राप्त होती। किन्तु एक दिन परिस्थिति ने नया मोड़ लिया। महाराज की सभा चल रही थी कि तभी अरब से एक दूत उनके दरबार में पहुँचा। उसका सम्मानपूर्वक स्वागत किया गया, किन्तु उसके आगमन ने सभा में उपस्थित सभी लोगों के मन में अनेक प्रश्न भी जगा दिए। उन प्रश्नों का उत्तर केवल वही दूत दे सकता था। कुछ समय पश्चात जब महाराज दाहिर ने उससे उसके आगमन का उद्देश्य पूछा, तब उसने विस्तार से अपनी बात रखनी आरम्भ की। उसने बताया कि लंका से अरब की ओर जा रहा एक व्यापारिक जहाज सिंध के समुद्री क्षेत्र में समुद्री लुटेरों द्वारा लूट लिया गया था। फिर उसने एक-एक करके उन सभी बहुमूल्य वस्तुओं का उल्लेख किया जो उस जहाज में थीं और यह भी बताया कि उस घटना से अरब को कितना नुकसान पहुँचा। इसके बाद उसने अरब शासकों का संदेश सुनाया। उनका आरोप था कि यह घटना सिंध की सीमा में हुई है, अतः इसकी जिम्मेदारी भी सिंध की है। उन्होंने मांग रखी कि सिंध इस हानि की भरपाई करे तथा अपने आधे भूभाग को क्षतिपूर्ति स्वरूप अरबों को सौंप दे। अन्यथा युद्ध के लिए तैयार रहे। उस अपमानजनक और धमकी भरे संदेश को सुनते ही सभा में उपस्थित प्रत्येक वीर का रक्त उबाल मारने लगा। सिंध के स्वाभिमानी योद्धाओं ने उस चुनौती का क्या उत्तर दिया? और स्वयं महाराज दाहिर ने उस समय क्या निर्णय लिया? इसी शब्द-चित्र को इस खण्डकाव्य की तीसरी स्मृति में प्रस्तुत किया गया है। •💬 अगर आपको यह कविता अच्छा लगा हो, तो नीचे कमेंट में अपनी राय जरूर बताइए। •📲 इसे अपने दोस्तों और परिवार के साथ भी शेयर कीजिए। •📚 ऐसी ही कविताएँ, कहानियाँ और ब्लॉग पढ़ने के लिए हमारी वेबसाइट से जुड़े रहिए। ✨ •🌸 आपके स्नेह के लिए धन्यवाद — Team RishNova
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