Itihaas Ka Aadi-Parv 🪶 ⚔️ – Rishabh Bhatt | Sindhpati Dahir : 712 AD

सिंधपति दाहिर : 712 ई॰

पहली स्मृति

इतिहास का आदि-पर्व

कोयल की मधुवर्षी सर्वर से, कहां सुबह बरसात हुई? जग जिससे चमक रहा, क्या जुगुनू से जगमग रात हुई? क्या बरस रहा सावन, घन अमृत के बूंदों में? जग हलचल जैसे दूर चला, मैं जाग रहा हूँ नींदों में, अब जाग उठो हे ज्ञानश्रेष्ठ, मौन लिए क्यों सोते हो? मुझ बंजर की खेती में, प्रश्नो के बीजों को क्यों बोते हो? क्षण लगता रण तुममें, क्षण मानवता का इतिहास मिले, हित अवनी के वीरों की, बलिदानों का आभास मिले, कभी प्रेम की गंगा बहती कभी लहू की धार बहे, अज्ञात सरित की व्यथा कहो, जो पल-पल लहूलुहान बहे, इन राख हुए पन्नो के, ज्वाला की तुम आग कहो, शोणित के छींटों से लतपत, पन्नों की तुम राग कहो, परिचय दो उस महा समर का, जिसके तुम अधिकारी हो, राज कहां? क्या काज तुम्हारा? तुम किस युग के अवतारी हो? तब रुक-रुककर उस पोथी की, हर पंक्ति जैसे डोल उठी, वो वीर करुण‌ रस संचित कर, मुख को अपने खोल उठी, करतल में सज्जित तलवारें, म्यानों से हो दूर चलीं, गहन निशा को चीर गगन में, प्राणों की वो दीप जली, नारी की मर्यादा ने, जौहर व्रत का श्रृंगार किया, क्षण नील‌ निलय में लाली बन, शोणित ने जैसे आधार लिया, मैं उस रण को धारण करती, जिसने बलिदानों को देखे हैं, मुझमें मानवता पर काली बन, अरि उत्पीड़न के लेखें हैं, सुधि मेरी उस सूदूर की है, जिसका रण आभास हुआ, संघर्ष हुई मैं पोथी अब तो, खंडित मेरा स्वास हुआ, मुझमें जन क्रंदन संग, वीरों का वंदन होगा, सुन-सुनकर करुण कथा यह, विकल तुम्हारा मन होगा। क्षण व्याकुल हो श्रोता बोला, अविरल रण व्याख्यान कहो, सजल राष्ट्र में आगम अरि का, जन-जन का बलिदान कहो, शौर्य कहो उन राजा की, उन पर अरि व्याधान कहो, हे ज्ञानश्रेष्ठ विस्तार रूप में, संगर का आख्यान कहो, अब देर करो न ज्ञानी तुम, मन जीवनमरू में प्यासी है, रसपान करू अज्ञेय कथा, अब विकल श्वास अभिलाषी है। किताब – सिंधपति दाहिर : 712 AD 🌿 Written by Rishabh Bhatt 🌿 ✒️ Poet in Hindi | English | Urdu 💼 Engineer by profession, Author by passion

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Echoes of 712 AD: The tragic hero of Sindh who stood against the storm.

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प्रथम स्मृति का आरंभ

सिंध की भूली हुई स्मृतियाँ ✨
नमस्कार प्रिय पाठकों! RishNova परिवार की ओर से आप सभी का इस ऐतिहासिक काव्य–श्रृंखला में स्वागत है। यह केवल एक कविता नहीं, बल्कि उन भूली हुई स्मृतियों को पुनर्जीवित करने का प्रयास है, जिन्हें समय, इतिहास और हमारी पीढ़ियाँ धीरे–धीरे विस्मृत करती चली गईं। आज भारत में रहने वाले दस लोगों से सिंध के सम्राट दाहिर के बारे में पूछा जाए, तो नौ लोग ऐसे होंगे जिन्हें उनका नाम तक ज्ञात नहीं होगा। यह हमारे देश का दुर्भाग्य है, जहाँ हम उस प्रथम जौहर को भूल चुके हैं जब महारानी रानीबाई ने अपनी अस्मिता की रक्षा के लिए अग्नि में प्रवेश कर लिया था। वहीं दूसरी ओर, इसी मिट्टी ने सूर्या देवी और परमाल देवी जैसी दो महान पुत्रियों को जन्म दिया, जिन्होंने अपने पिता की मृत्यु का प्रतिशोध अरब तक जाकर लिया। जिसका मूल्य उन्हें अपनी वीभत्स मृत्यु के साथ चुकाना पड़ा। उन्हें जलती, तपती रेगिस्तानी रेत पर निर्वस्त्र कर घोड़ों से बाँधकर तब तक घसीटा गया, जब तक उन्होंने अपने प्राण त्याग नहीं दिए। इतनी क्रूरता उसी पश्चिमी दुनिया में संभव थी, जिसे आज भी हमें एक विजेता के रूप में पढ़ाया जाता है। लेकिन इतने महान सम्राट दाहिर, जौहर की अग्नि में आज तक अस्तित्वमान महारानी रानीबाई, और सूर्या देवी तथा परमाल देवी जैसी सुपुत्रियाँ — जिनके आगे नतमस्तक हो जाने का हृदय करता है — हमारे सिलेबस और स्मृतियों, दोनों से बाहर हैं। हमारा इतिहास या तो उन्हें भूल चुका है, या उनसे पूर्णतः अपरिचित है। इन्हीं भूली हुई स्मृतियों को पुनः जीवित करने के लिए मैंने इस खंडकाव्य में भागों, अध्यायों और सर्गों का प्रयोग न करके इसे “स्मृतियों” में विभाजित किया है। आपके समक्ष प्रस्तुत है पहली स्मृति, जिसकी शुरुआत कुछ इस प्रकार होती है— एक व्यक्ति, जिसके हाथों में एक पुस्तक थी — फटी–पुरानी, जले हुए पन्नों वाली, जिन पर कहीं–कहीं रक्त के धब्बे भी पड़े हुए थे। वह पुस्तक शताब्दियों पुरानी प्रतीत होती थी। उस पर क्या लिखा था, यह उस व्यक्ति की समझ से परे था। वह केवल इतना जानना चाहता था कि वह पुस्तक किस युग की है? किस युद्ध की कथा अपने भीतर समेटे हुए है? और कौन–से राजा उसके नायक हैं? इन्हीं प्रश्नों में डूबा वह व्यक्ति बाहरी दुनिया की हलचलों से दूर हो चुका था। वह बार–बार उस पुस्तक को समझने का प्रयास कर रहा था। आखिरकार उसका प्रयास सफल हुआ… और वह पुस्तक बोल उठी। उस पुस्तक ने उस व्यक्ति को “पाठक” कहकर संबोधित किया। अपना परिचय देते हुए वह बोली — “मैं उस युद्ध की साक्षी हूँ, जिसे आज का युग भूल चुका है।” इसके पश्चात उस पुस्तक ने अपने भीतर छिपे दर्द, साहस और अरोर के युद्ध की कथा पाठक के समक्ष प्रस्तुत करनी आरंभ की। जिसे सुनकर पाठक के मन में जिज्ञासा और रोमांच दोनों जाग उठे। वह उस ऐतिहासिक युद्ध को विस्तार से सुनने का आग्रह करने लगा। पाठक के अनेक अनुरोधों के बाद अंततः पुस्तक ने उसे वह सब बताना आरंभ किया, जो 712 ई॰ में सिंध की भूमि पर भारत के इतिहास में घटित हुआ था। और यदि आप इन भूली हुई स्मृतियों को और अधिक विस्तार, भावनाओं और विशेष प्रस्तुति के साथ अनुभव करना चाहते हैं, तो यह संपूर्ण काव्य–श्रृंखला एक पुस्तक के रूप में भी उपलब्ध है। जिसे आप अपने संग्रह का हिस्सा बनाकर, इतिहास के उन पन्नों को और करीब से महसूस कर सकते हैं, जिन्हें समय धीरे–धीरे धुंधला करता चला गया। •💬 अगर आपको यह कविता अच्छा लगा हो, तो नीचे कमेंट में अपनी राय जरूर बताइए। •📲 इसे अपने दोस्तों और परिवार के साथ भी शेयर कीजिए। •📚 ऐसी ही कविताएँ, कहानियाँ और ब्लॉग पढ़ने के लिए हमारी वेबसाइट से जुड़े रहिए। ✨ •🌸 आपके स्नेह के लिए धन्यवाद — Team RishNova
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