दिव्य भक्ति संग्रह
Hanuman Ji Specialबालक सा न निहारो
लाल तेरो बड़ हो गयो राम किनारो,
मातृ प्रेम के हिय से सारे कष्ट निवारो,
पीछे मेरे, छोड़ काज यूं दिन न वारो,
ओ मईया मोको बालक सा न निहारो।
याद है न? आम समझ सूरज ही को खाया मैंने,
प्रेम तेरी दुर्लभ उस दिन चितवन से लगायो मैंने,
भेज दयी मोको संग शिव ने आ जब हाथ पसारो,
ओ मईया मोको बालक सा न निहारो।
राम नाम ले सिंधु लांघ हूँ आयो रे,
जानकी मां ने रघुवर को संदेशा–
मुझ ही से तो पठायो,
प्रेम नाथ का मुझपे रहता औ आशीष तुम्हारो,
ओ मईया मोको बालक सा न निहारो।
कौन कहे मोको हूँ मैं वानर बलशाली?
वास करें हैं प्रतिपाल मुझमें राघव शक्तिशाली,
हाथ नाथ के हाथ में जो चाहूं कौन सहारो?
ओ मईया मोको बालक सा न निहारो।
वयस्क खड़ो है शिशु तेरो मारुति प्यारो,
बाल्य काल सा पर मैया मोको आज सँवारों,
नटखट हो जाऊं तो फिर से पकड़ो कान हमारो,
ओ मईया मोको बालक सा क्षण निहारो।
🌿 Written by Rishabh Bhatt 🌿
✒️ Poet in Hindi | English | Urdu
💼 Engineer by profession, Author by passion
चौथे बड़े मंगल पर एक खास भेंट
वीर मारुति की अनकही कहानी 🙏 मेरे प्यारे दोस्तों,
आप सभी को RishNova परिवार की तरफ से ज्येष्ठ मास के चौथे बड़े मंगल की बहुत-बहुत शुभकामनाएं!
आज इस खास मौके पर, हम आपके लिए एक बेहद भावुक और प्यारी कविता लेकर आए हैं। जिसे आपने अभी ऊपर पढ़ा, आइए अब मैं आपको उस सुंदर और भावुक दृश्य की ओर ले चलता हूँ जहाँ यह कविता आकार लेती है।
दृश्य त्रेतायुग का है। रावण का वध हो चुका है। लंका पर विजय प्राप्त कर प्रभु श्री राम, माता सीता, लक्ष्मण जी और पूरी वानर सेना के साथ पुष्पक विमान से अयोध्या लौट रहे हैं। रास्ते में जब विमान हनुमान जी के घर (किष्किंधा के पास) से गुजरता है, तो प्रभु राम हनुमान जी की माता, माता अंजनी से मिलने रुकते हैं।
सोचिए, हनुमान जी जिन्होंने समुद्र लांघा, लंका जलाई, लक्ष्मण जी के लिए संजीवनी बूटी लाए और जो तीनों लोकों में सबसे बलशाली हैं... जब अपनी माता के सामने आते हैं, तो माता अंजनी उन्हें देखकर भावुक हो जाती हैं। एक मां के लिए उसका बच्चा कभी बड़ा नहीं होता। माता अंजनी हनुमान जी को वैसे ही दुलारने लगती हैं, जैसे वह कोई छोटे से नादान बालक हों।
तब हमारे संकटमोचन, जो अब महाबली वीर हनुमान हैं, अपनी माता को बड़े ही प्रेम और आदर से समझाते हैं कि "मां, अब मैं बड़ा हो गया हूँ।" यह कविता इसी अद्भुत, ममतामयी और भक्ति से भरे क्षण का जीवंत रूप है।
चलते-चलते...
कैसी लगी आपको माता और पुत्र के इस अलौकिक प्रेम की अभिव्यक्ति? कविता की आखिरी पंक्तियों में हनुमान जी का यह कहना कि "अगर नटखट हो जाऊं तो फिर से कान पकड़ लेना"—यही तो एक सच्चे पुत्र का अपनी मां के प्रति समर्पण है। हनुमान जी भले ही दुनिया के लिए 'महावीर' हैं, पर अपनी मां के सामने आज भी वही 'मारुति' हैं।
इस चौथे बड़े मंगल पर हमारी हनुमान जी से यही प्रार्थना है कि वे सभी को एक बालक की तरह अपनी छत्रछाया में रखें, हमारे सभी संकटों को हर लें और हमारे भीतर प्रभु राम के प्रति ऐसी ही अटूट भक्ति जगाएं।
अगर भक्ति आपको सुकून देती है, तो हर Friday हमारे ब्लॉग पर लौटना न भूलें। हर सप्ताह श्रद्धा, आस्था और प्रेरणा से जुड़ी नई रचनाएँ आपके लिए लेकर आते हैं। एक बार फिर से आप सभी को चौथे बड़े मंगल की हार्दिक बधाई! कमेंट सेक्शन में 'जय सियाराम' और 'जय बजरंगबली' लिखना न भूलें।
॥ जय श्री राम... जय बजरंगबली ॥
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