आसमान पर बचे हुए नारंगी रंग धीरे-धीरे स्याही में बदल रहे थे। छोटे से रेलवे स्टेशन पर भीड़ का शोर अब थमने लगा था। कुछ देर पहले गुज़री पैसेंजर ट्रेन अपने साथ अधिकांश यात्रियों को ले जा चुकी थी और पीछे छोड़ गई थी बस एक लंबी खामोशी।
प्लेटफ़ॉर्म की पुरानी बेंच पर एक अजनबी अकेला बैठा था। उसकी नज़रें बस दूर तक फैली रेलवे पटरियों पर टिकी थीं, मानो लोहे की उन सीधी लकीरों में वह अपनी ज़िंदगी का कोई जवाब खोज रहा हो।
हवा का हल्का झोंका आया और प्लेटफ़ॉर्म पर पड़ा एक सूखा पत्ता पटरियों की ओर उड़ गया। अजनबी की आँखें उसी पत्ते का पीछा करती रहीं। उसके चेहरे पर एक अजीब सी शांति थी, जैसे वह दुनिया को देख नहीं रहा, बल्कि उसे महसूस कर रहा हो।
उसी समय ड्यूटी ख़त्म करके घर लौट रहा एक राही प्लेटफ़ॉर्म पर पहुँचा। उसने देखा कि पूरा स्टेशन खाली है, लेकिन एक अनजान शख़्स कई मिनटों से बिना हिले उन्हीं पटरियों को देखे जा रहा है। जिज्ञासा उसे उस अजनबी तक खींच लाई। वो मुस्कुराते हुए उसके पास पहुँचा और कुछ पल उसकी नज़र का पीछा करने के बाद बोला—
र
राही
क्या सोच रहे हो?
अजनबी
कौन… मैं?
अ
र
राही
हाँ, तुम्हीं। तुम्हारे अलावा और कौन है इस सुनसान रेलवे स्टेशन पर?
अजनबी
कुछ नहीं… बस इन पटरियों के खालीपन को देख रहा था। रेलवे स्टेशन की इन तन्हाइयों में जैसे हज़ारों लफ़्ज़ छिपे हों। उन्हीं से बुनकर कोई शब्द बना रहा हूँ।
अ
र
राही
तो बना?
अजनबी
क्या?
अ
र
राही
वही शब्द… जो बना रहे हो।
अजनबी
हाँ, बना। टूटा–फूटा सा।
अ
र
राही
सुनाओ ज़रा।
अजनबी
सच में सुनना चाहोगे?
अ
र
राही
क्यों नहीं!
अजनबी
ठीक है फिर, सुनो।
अ
र
राही
हूँ..
अजनबी
‘इश्क़’ — यही वो शब्द है जिसे मैंने खामोशियों की धुन से ढूँढ निकाला। इस धुन में जब मैंने खुद को शामिल किया, तो एहसासों का एक पिटारा मिला, जिसने मुझे दो पल की मुस्कान दी।
अ
र
राही
सच में?
अजनबी
हाँ।
अ
र
राही
क्या मुझे भी इस धुन को सुनने में मदद करोगे? सुबह से काम का थका हूँ, मैं भी चाहता हूँ सुकून के एक पल की मुस्कान।
अजनबी
मेरे दोस्त, जिन पटरियों पर मैंने खालीपन देखा, उन्होंने मेरी तन्हाई दूर कर दी। इन्होंने मुझे एक ही पल में कई बातें सिखा दीं।
अ
र
राही
ऐसा क्या छिपा है इन पटरियों में, जो मुझे नहीं दिखाई दे रहा?
अजनबी
आँखें बंद करके महसूस करो इनको। मैंने भी जब तक आँखों का सहारा लिया, खालीपन और तन्हाई ही हाथ लगी।
अ
र
राही
मेरी आँखें शायद वो नहीं देख पा रहीं जो तुम दिखाना चाहते हो। तुम ही बताओ, आखिर क्या–क्या कह रही हैं ये पटरियाँ?
अजनबी
मेरे स्टेशन पर पटरी की बस एक ही लाइन है। उसी से रेल आती है… और उसी से वापस जाती है। ये मुझे सिखाती हैं कि इंसान की ज़िंदगी भी इस एक लेन पटरी की तरह है, जिस पर अच्छे और बुरे दोनों ही हालात का आना लिखा है।
दर्द और खुशी, इश्क़ और नफ़रत, भरोसा और धोखा, हँसी और आँसू — सबका आना–जाना इसी एक ज़िंदगी में होगा। अगर दुख आया है, तो उसकी वापसी भी तय है… जैसे हर गुजरती रेल की।
अ
र
राही
कमाल है… मैंने कभी यूँ नहीं सोचा। पर बताओ, जहाँ दो पटरियाँ होती हैं — आने और जाने की अलग–अलग — वहाँ क्या सीख छिपी है?
अजनबी
जैसे एक लेन की पटरियाँ ज़िंदगी के जैसी हैं, वैसे ही दो लाइनें एक रिश्ते को दिखाती हैं। एक रिश्ता, जिसमें दो लोग मोहब्बत की वो कड़ी हैं जो हर मोड़ पर एक–दूसरे के साथ हैं, जिनका साथ होना ही उनकी ताकत है।
दो लेन पटरियों पर रेलगाड़ी के आने और जाने की अलग–अलग लाइनें होती हैं। ये हमें बताती हैं कि एक रिश्ते में जुड़े दो लोगों की परिस्थितियाँ अलग हो सकती हैं, सोचने का तरीका अलग हो सकता है; लेकिन उन पटरियों की तरह उन्हें हमेशा साथ रहना चाहिए।
रेलगाड़ी तो हालात के जैसी है, जो आएगी और चली जाएगी। एक के लिए सही दिशा हो सकती है तो दूसरे के लिए विपरीत; मगर पटरियाँ यानी रिश्ता, अनंत तक एक ही राह पर साथ चलता है।
अ
र
राही
इतनी गहराइयाँ छिपी हैं यहाँ… मुझे हैरानी है कि इन पर किसी ने ख्याल क्यों नहीं किया।
अजनबी
कोई बात नहीं, अब ख़्याल करो। शायद तुम कुछ और भी ढूँढ लो, जो मुझे अभी तक दिखाई नहीं दिया।
अ
“ज़िंदगी और रिश्ते रेलवे की पटरियों की तरह हैं—हालात बदलते रहते हैं, मगर साथ और विश्वास बना रहे, तो हर सफ़र अपनी मंज़िल तक पहुँच ही जाता है।” – ऋषभ भट्ट
Written by
Rishabh Bhatt
Storyteller • Poet • Engineer
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An Author, Poet & Engineer — wandering through worlds of logic, language, and longing. I turn emotions into stories and moments into art. Through books like “Mera Pehla Junoon Ishq Aakhri”, “Kasmein Bhi Du To Kya Tujhe”, “Unsaid Yet Felt”, “Incompleteness At Every Turn”and many more. I write of love, heartbreak, truth, and hope — where every line carries a soul. My works live on Pocket Novel, Amar Ujala Kavya, Amazon, Notion Press, Pothi.com and more. Founder of RishNova, I believe every untold story holds the power to heal, connect, and stay — forever.