RishNova Presents | From The Book : Kasmein Bhi Doon Toh Kya Tujhe?
शराब की बोतल
रात अपने आधे सफ़र से गुजर चुकी थी। शहर की चकाचौंध से दूर, एक पुराने से मकान के कमरे में पीली रोशनी का एक बल्ब जल रहा था। कमरे में सन्नाटा था, ऐसा सन्नाटा जिसमें घड़ी की टिक-टिक भी किसी कहानी का हिस्सा लग रही थी। कमरे की एक शेल्फ़ पर एक शराब की बोतल रखी थी। बोतल पुरानी थी, मगर धूल से ढकी नहीं। ऐसा लगता था जैसे कोई उसे रोज़ देखता हो, छूता हो, बस खोलता नहीं।
उस रात भी दो पुराने दोस्त आमने-सामने बैठे थे। एक के हाथ में सवाल थे, दूसरे की आँखों में जवाब। दोस्ती को पाँच साल हो चुके थे, मगर उन पाँच सालों में एक सवाल कभी पुराना नहीं हुआ— वो शराब की बोतल। आख़िर ऐसा क्या था उस बोतल में, जिसे उसका मालिक अपने पास रखता तो था, मगर कभी पीता नहीं था? आज शायद उस सवाल का जवाब मिलने वाला था...
द
दोस्त
ड्रिंक करते हो?
मुसाफ़िर
नहीं तो।
म
द
दोस्त
झूठ बोल रहे हो। 5 सालों से जनता हूं तुम्हें, जब भी तुम्हारे कमरे में आया एक शराब की बोतल रखा जरूर देखा है मैंने।
मुसाफ़िर
तुमने एक देखा होगा। मैं तो एक ही देखता हूँ। हर रोज़... बस जगह बदलते... 5 सालों से।
म
द
दोस्त
तो तुम ड्रिंक नहीं करते?
मुसाफ़िर
नहीं।
म
द
दोस्त
फिर तुमने वो शराब का बोतल अपने पास क्यूं रखा है?
मुसाफ़िर
पीने के लिए।
म
द
दोस्त
कब?
मुसाफ़िर
पता नहीं... बस पियूंगा। तब जब ऐसा लगेगा कि ज़िंदगी में रखने के लिए अब आगे कोई कदम नहीं है।
म
द
दोस्त
मेरी समझ से बाहर हैं तुम्हारी ये बातें, तुम अच्छे से जानते हो। वैसे वक्त के साथ वो शराब और भी कड़क हो गई होगी।
मुसाफ़िर
हूँ.. और इश्क़ भी..
म
द
दोस्त
क्या खास है इस बोतल में ? जो तुमने 5 सालों से इसे यूं रखा है।
मुसाफ़िर
ख़ास बोतल नहीं वो थी जिसके लिए मैंने इसे खरीदा था।
म
द
दोस्त
कौन थी वो?
मुसाफ़िर
इश्क़ ❤️
म
द
दोस्त
तुम्हारी आशिकी भरी बातों से इतना तो समझ सकता हूँ, इश्क़ का ही मामला होगा। मगर कौन थी वो? और कहां गई?
मुसाफ़िर
उसको बताने के लिए काश कोई लफ्ज़ मौजूद होते। दुनिया में कोई ऐसी खुसूरती होती कि मैं कह सकता वो इससे भी नायब थी। अफसोस ऐसा कुछ नहीं जिससे उसको आंका जा सके। बस इतना समझ लो अगर चांद से खूबसूरत कुछ है और कोहिनूर से भी कीमती तो बस वही है।
म
द
दोस्त
कहां है वो?
मुसाफ़िर
वहीं जहां उसे होना चाहिए।
म
द
दोस्त
तो फिर तुम्हारे पास क्यूं नहीं है वो?
मुसाफ़िर
वो मुझमें है। रही बात पास होने की तो उसकी खुशी कहीं और थी।
म
द
दोस्त
उसने तुम्हें धोखा दिया?
मुसाफ़िर
धोखा चाहतों को मिलता है। इश्क़ तो आज़ाद होता है… और अधूरा भी। चाहत नहीं थी, इसलिए धोखा नहीं मिला। इश्क़ था… इसलिए आज़ादी मिली, और अधूरापन भी।
म
द
दोस्त
तुम कोई सच्चे आशिक लगते हो…
मुसाफ़िर
आशिकी पागल करती है और सच्चाई जीना सिखाती है। दोनों अलग ही रहने दो।
म
द
दोस्त
ठीक है, पर ये शराब की बोतल? कब तक रखोगे इसे अपने पास?
मुसाफ़िर
मैं उसे प्रपोज करने वाला था। इस शराब की बोतल को पकड़े बैठा रहा, घंटों… मगर वो आई ही नहीं। काफी इंतजार करने के बाद उसके घर गया, तो वो खुश थी किसी और के साथ…। मैंने पूछा तो उसने एक ही जवाब दिया– वो उससे प्यार करती है। बिना पिए उस दिन कदमों में खड़े होने की ताकत न थी। अपने घर लौट चलूं इतना भी होश नहीं था। फिर मुझे समझ आया इस इश्क़ में ज्यादा नशा है और दर्द में उतनी ही ज्यादा ताकत। शराब की बोतल अपने पास रखकर भी नहीं पीता... बस इसलिए कि कहीं ये नशा न उतर जाए।
म
“जिसे हम हार समझते हैं, कभी-कभी वही मोहब्बत का सबसे ख़ूबसूरत पहलू होता है।” – ऋषभ भट्ट
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