नमस्कार! मेरे प्यारे दोस्तों,
ये कविता
28 जून 2022 को उदयपुर में हुई कन्हैया लाल की हत्या के पर लिखी गई थी। उस दिन जो दर्द, गुस्सा, बेबसी और सवाल मन में थे, वही बिना किसी योजना के शब्दों में बदल गए। इसलिए इस कविता को पढ़ते समय यह याद रखिए कि यह किसी घटना का विश्लेषण नहीं, बल्कि उस पल की एक भावनात्मक प्रतिक्रिया है।
आज
2026 में, जब मैं यह Author's Note लिख रहा हूँ, तब चार साल बीत चुके हैं। समय बदल गया, खबरें बदलीं... लेकिन कुछ सवाल आज भी वहीं खड़े हैं।
कन्हैया लाल, उमेश कोल्हे, रिंकू शर्मा जैसे मामले हों, या हाल के वर्षों में सामने आए तरुण हत्या मामला, सूर्य चौहान की हत्या, पहलगाम आतंकी हमला और ऐसी कई दर्दनाक घटनाएँ—हर बार एक परिवार उजड़ता है, हर बार किसी माँ का बेटा, किसी पत्नी का पति, किसी बच्चे का पिता छिन जाता है। इन घटनाओं के तथ्य, जांच और अदालत की प्रक्रिया अपने-अपने स्थान पर हैं, लेकिन इतना तय है कि निर्दोष की मौत कभी सामान्य नहीं हो सकती।
इस कविता में बार-बार "जेहाद" शब्द आया है। मेरा विरोध किसी धर्म से नहीं है। मेरा विरोध उस कट्टर सोच से है जो धर्म का नाम लेकर हत्या को सही ठहराती है। अगर कोई आतंकवादी "अल्लाहु अकबर" कहकर किसी निर्दोष की जान लेता है, तो वह सबसे पहले इस्लाम को बदनाम करता है। उसी तरह अगर कोई किसी भी धर्म के नाम पर हिंसा करता है, तो वह अपने धर्म की मूल भावना का अपमान करता है।
मैं आज भी वही मानता हूँ जो इस कविता में लिखा है—
"मैं हिन्दू हूँ, मुसलमान मेरा साथी है।"
मेरी लड़ाई किसी मुसलमान से नहीं है। मेरी लड़ाई उन लोगों से है जो हिंदू और मुसलमान के बीच नफ़रत बोकर अपनी राजनीति, अपनी विचारधारा या अपने आतंक को ज़िंदा रखना चाहते हैं। करोड़ों मुसलमान शांति से जीते हैं, अपने परिवार का पालन-पोषण करते हैं और इस देश से उतना ही प्यार करते हैं जितना कोई और भारतीय करता है। उन्हें किसी आतंकवादी या कट्टरपंथी की सोच से नहीं जोड़ा जा सकता।
लेकिन एक बात उतनी ही सच है—जब भी किसी निर्दोष की हत्या होती है, चाहे उसका नाम कन्हैया लाल हो, उमेश कोल्हे हो, हर्षा हो, रिंकू शर्मा हो, तरुण हो, सूर्य चौहान हो या पहलगाम में मारे गए निर्दोष नागरिक हों, तब समाज का चुप रह जाना भी एक समस्या बन जाता है। किसी भी निर्दोष की हत्या पर हमारी संवेदना उसकी पहचान देखकर नहीं बदलनी चाहिए।
यह कविता किसी समुदाय के खिलाफ नफ़रत फैलाने के लिए नहीं लिखी गई। यह उन लोगों के खिलाफ लिखी गई है जो इंसानियत से ऊपर कट्टरता को रख देते हैं। अगर इस कविता को पढ़कर कोई व्यक्ति किसी धर्म से नफ़रत करने लगे, तो उसने इस कविता का अर्थ नहीं समझा। लेकिन अगर इसे पढ़कर कोई आतंकवाद, धार्मिक कट्टरता और निर्दोषों की हत्या के खिलाफ आवाज़ उठाने का साहस पाए, तो मुझे लगेगा कि मेरी लेखनी अपने उद्देश्य तक पहुँची।
मैं मानता हूँ कि देश की एकता केवल नारों से नहीं, बल्कि न्याय, सच और समान संवेदना से बनती है। जब तक हर निर्दोष की जान को बराबर महत्व नहीं मिलेगा, तब तक हमारे ज़ख्म भर नहीं पाएँगे। आख़िर में बस इतना—
धर्म इंसान को बेहतर बनाता है। जो धर्म के नाम पर इंसानियत छीन ले, वह धर्म नहीं, कट्टरता है। और मेरा विरोध हमेशा उसी कट्टरता से रहेगा।
— ऋषभ भट्ट & RishNova Team
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