उर्दू नज़्में
Season–1तू न आई 👀
बन करके मेरे पुरसिस में पहनाई,
तू न आई,
होने को ढ़ाई साल आए
मगर तू न आई।
इक ख़्वाब लफ्ज़ो की झाड़ियों में
गुलमोहर की तरह
होंठों पर पनपने लगी,
सिमटने लगी बाहों में तन्हाईयां
यूं शाम धीरे-धीरे ढलने जा रही थी,
गुनगुनाती राग में जुगनुएं
चांद को अपने फलक में ढ़क रही
नाकाम कोशिशें दोहरा रहीं थीं,
मेरी भी कोशिश थी
इक जरिया जिद-ओ-जहन में पाने की,
पैग़ाम सा भरकर जहन को इश्क़ में
अश्क की दरिया डुबाने की,
नज़्म नस्लों से भरें तेरे रूह को
छूने की कोशिशें करती
सुबह-ओ-शाम, फिर भी
पर परिंदों के शहर से लौट आती
पैग़ाम ले, तेरी ख़बर न आज भी...
तेरी गली में तालाश का
ये सिलसिला वर्षों चला,
हर मोड़ पर कई मिलें, कई गयें
मगर तुझ सा अंदाज हरगिज़ न छाई,
बन करके मेरे पुरसिस में पहनाई,
तू न आई,
होने को ढ़ाई साल आए,
मगर तू न आई।
किताब : कसमें भी दूं तो क्या तुझे?
🌿 Written by Rishabh Bhatt 🌿
✒️ Poet in Hindi | English | Urdu
💼 Engineer by profession, Author by passion
Author's Note
हर नज़्म के पीछे की छोटी-सी कहानी"तू न आई", ये नज़्म उस इंतज़ार की कहानी है, जिसका कोई End Date नहीं था। जहाँ इंसान को यह भी नहीं पता कि सामने वाला कभी आएगा भी... या नहीं।
जब भी मैं इंतज़ार के बारे में सोचता हूँ, तो लगता है कि ये बस हमारी कहानी नहीं है। राधा और गोपियों का कृष्ण के लिए इंतज़ार, मीरा का अपने मोहन ही के लिए समर्पण, या फिर आज की generation में Stranger Things के Mike का Eleven के लिए इंतज़ार। वक़्त किस्सा बदलता है, किरदार बदलते हैं, लेकिन इंतज़ार का एहसास कभी नहीं बदलता। सदियाँ गुज़र जाती हैं, मगर दिल उसी उम्मीद को थामे रहता है। कि शायद मेरी ज़िंदगी का ये इंतज़ार एक दिन खत्म होगा।
शुरू में लगता था, कुछ दिन और... फिर शायद सब ठीक हो जाएगा। लेकिन देखते ही देखते वक़्त अपनी रफ़्तार से चलता रहा, और कब ढाई साल गुज़र गए, पता ही नहीं चला। उसी दिन एहसास हुआ कि इंतज़ार कैलेंडर से नहीं, उम्मीदों की घटती बूंद से गिना जाना चाहिए । और उन्हीं उम्मीदों की घटती बूंदों ने "तू न आई" को जन्म दिया।
इस नज़्म में कुछ उर्दू अल्फ़ाज़ शायद थोड़े मुश्किल लगें। लेकिन मेरी कोशिश हमेशा यही रही है कि अगर कोई शब्द समझ में न भी आए, तो उसका एहसास दिल तक ज़रूर पहुँच जाए। क्योंकि आख़िर में Poetry का रिश्ता शब्दों से कम, जज़्बातों से ज़्यादा होता है।
"तू न आई" बस मेरा या एक–दो इंसान का इंतज़ार नहीं है। ये उन तमाम लोगों की कहानी है, जिन्होंने कभी किसी Reply, किसी दस्तक, किसी मुलाक़ात या किसी वापसी का इंतज़ार किया है... और फिर भी उम्मीद का दरवाज़ा बंद नहीं किया। तो अगर ये नज़्म पढ़ते हुए आपको भी कभी किसी का इंतज़ार याद आ जाए... तो समझूंगा शायद हम आप एक ही कहानी के अलग-अलग किरदार हैं।
अगर ये नज़्म आपको थोड़ा भी connect कर पाया हो, तो नीचे comment करके अपनी बात ज़रूर बताइए। 💬 इसे अपने दोस्तों के साथ share भी कीजिए, शायद किसी को इसकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत हो। ❤️ और हाँ, हर Friday RishNova पर एक नया ब्लॉग आता है, तो अगला पढ़ना miss मत कीजिए! ✨
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