उर्दू नज़्में
Season–1तुम मुझे छोड़ तो नहीं दोगे? ☁️
एक डर हर वक्त सताए जाता है,
तेरी रूह को बाहों में,
ख्वाहिशों को पलकों में छिपता है,
उन टूटते तारों सा मेरी आजमाइशों को
तोड़ तो नहीं दोगे?
तुम मुझे छोड़ तो नहीं दोगे?
ये चाहकर भी भूल नहीं पाता हूं,
खुद की नहीं किताबों की बताता हूं,
कश्तियां दिल की कहीं डूब जाती हैं,
इन ख्वाहिशों के आईने में टूट जाती हैं,
पर तुझपे भरोसा है मेरी जाना!
इन रश्क से बढ़कर कहीं
तुझमें ठहर, तुझमें ठिकाना,
एक चैन भी है जो तेरी सांसों में अटकती है,
सूरज भी छूता है जब तेरे साए को,
आंखों को हर बार खटकती है,
पागल सा कभी–कभी दीवारों से बात करता हूं,
सौग़ात ले तेरे दुआओं की तस्वीर से गुजरता हूं,
फिर भी एक डर हर वक्त सताए जाता है,
तेरी रूह को बाहों में,
ख्वाहिशों को पलकों में छिपता है,
उन टूटते तारों सा मेरी आजमाइशों को
तोड़ तो नहीं दोगे?
तुम मुझे छोड़ तो नहीं दोगे?
किताब : कसमें भी दूं तो क्या तुझे?
यह कविता प्रसिद्ध गीतकार मनोज मुंतशित शुक्ला जी द्वारा लिखी गई नज़्म ‘तुम मुझे छोड़ तो नहीं दोगी?’ से प्रेरित होकर अपनी भावों में लिखा गया एक प्रयास मात्र है। इसका उद्देश्य किसी भी प्रकार का कॉपीराइट उल्लंघन करना नहीं है।
🌿 Written by Rishabh Bhatt 🌿
✒️ Poet in Hindi | English | Urdu
💼 Engineer by profession, Author by passion
Author's Note
हर रचना के पीछे की छोटी-सी कहानी"तुम मुझे छोड़ तो नहीं दोगे?" सिर्फ़ एक नज़्म नहीं, बल्कि एक ऐसा सवाल है जो शायद मोहब्बत करने वाला हर इंसान कभी-न-कभी ख़ुद से ज़रूर पूछता है।
मेरी writing की journey वैसे तो इससे पहले ही शुरू हो चुकी थी, लेकिन उसे सही दिशा मिली मनोज मुंतशिर शुक्ला सर के YouTube Channel से। पहली बार जब मैंने उनकी Masterclass with Manoj Muntashir Series का एक वीडियो देखा, तो ऐसा लगा जैसे मुझे कोई बहुत कीमती चीज़ मिल गई हो। वक़्त के साथ एहसास हुआ कि वह महसूस करना बिल्कुल सही था। उनके अल्फ़ाज़ ने मुझे सिर्फ़ लिखना नहीं, बल्कि महसूस करके लिखना सिखाया।
इसी दौरान मैंने उनके चैनल पर उनकी एक कविता पढ़ी थी—"तुम मुझे छोड़ तो नहीं दोगी?" मेरी यह नज़्म उसी एहसास से प्रेरित है। इसका लहज़ा थोड़ा अलग है, अल्फ़ाज़ मेरे हैं, लेकिन अगर इसमें कहीं वही सच्चाई, वही दर्द या वही ख़ूबसूरती महसूस हो, तो उसका एक बड़ा हिस्सा मनोज सर की सीख का है।
मुझे लगता है कि मोहब्बत में सबसे बड़ा डर जुदाई का नहीं होता... सबसे बड़ा डर उस ख़याल का होता है, जब अचानक दिल पूछ बैठता है—"अगर यही इंसान, जो मेरी पूरी दुनिया है... एक दिन मुझे छोड़कर चला गया तो?"
यही ख़याल दिल में एक अजीब-सी बेचैनी भर देता है। कोई वजह नहीं होती, फिर भी दिल भारी-सा रहने लगता है। इंसान बार-बार उसी चेहरे को देखना चाहता है, उसी आवाज़ को सुनना चाहता है, और बस एक ही दुआ करता है—यह रिश्ता, यह साथ, यह मोहब्बत... कभी ख़त्म न हो।
शायद इसी एहसास को मैंने इस नज़्म में समेटने की कोशिश की है। क्योंकि कभी-कभी मोहब्बत की सबसे सच्ची बात "आई लव यू" नहीं होती... बल्कि बस इतना-सा सवाल होता है— "तुम मुझे छोड़ तो नहीं दोगे?"
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