Aatatayi Ka Antardwandva 🥩 ⚔️ – Rishabh Bhatt | Sindhpati Dahir : 712 AD

सिंधपति दाहिर : 712 ई॰

दूसरी स्मृति

आततायी का अंतर्द्वंद्व

तारक वो तिमिर निशा का, चम-चम चमके प्रभा अमर, बरस उठे सावन संग, सुमन गगन से नित झर-झर, रव गूंज उठे कानों में, कल-कल किलकित गानों में, जो ढूंढ चले यों नयन सुअन वो, मिले न भव उपमानों में, वो ज्योति सुमन उर में बसती, करती उर में अनुपम लय, अब होती है आरम्भ कथा, कर नमो-नमो दुर्गे की जय। रंगमंच सा दरबार सजा, नाच रही साकी बाला, हाला में हाला बहती दरबार बनी मधुशाला, मधुमत्त हुए दरबारी, हाथों में भर-भर प्याला, अधरों से मधु बरस रहे, क्षण छलक उठी छल-छल हाला, सुंदरियों के लाल कपोलों को, देख-देख छाई कुम्हलाई, प्याली में मदिरा, मदिरा में प्याली, भारी सुघराई पर सुघराई, अंगड़ाई में अंगड़ाई लेता, पीता अधरों की लाली को, कभी निकलता अल–हज्जाज, खलीफा, पीने को मधुमय प्याली को, उन्मादी मतवाला सा झूम उठे, पायल की छुन-छुन छुन-छुन पर, बहुरंगी तस्वीरों से दीवार सजे, सजे युवतियों से सुन्दर। फिर भी उर में कोलाहल छाये, पूरब में भगवा लहराए, सिन्धु सरित बाधक बन आए, सिंधपति के जय-जय छाएं, सोच रहा उर बहुत वितान, पूरण कब होगा अरमान? पल-पल बढ़ता जिसका उत्थान, उस पर जाता मेरा ध्यान, कैसी ये पूरब की शान? अम्बर सा बढ़ता उत्तान, कैसी है वो स्वर्ण जहान? जिस पर रोम-रोम बलिदान, कैसी है बलिहारी जय-जय? कैसी है अधिकारी संचय? कैसी है गज? कैसी हय? कैसी जय उन पर दुर्जय? कैसी है तीखी तलवार? शोणित की प्यासी खरधार, शायक धनु से लक्ष्य उतार, ले ले धाये कुन्तल कटार, उत्सव नाच रहे नर-नारी, उत्तम रण कौशल अधिकारी, रोर तड़ित में बदल जाए क्षण, सिंधपति वो सौ पर भारी। मीर सुनो, तुम अब भी उर में रहती अंकुश वादी, शायक सी चुभती, पावक सी– जलती भारत की आजादी, वासर एक मिले चरणों में, सिंधपति के म्यानों को, छिन्न-भिन्न मैं कर जाऊं, उस अचल राज-अभिमानों को, तभी मिले इस मन्द पवन को, संबल बन विस्तार, तभी मिले इस तृषित स्वास को, रुधिर सरित व्यापार। खेल रही नियति भी, दे पासों को अरि हाथों में, कष डोल उठी क्षण धर्मराज की, लिखने को रण माथों पे, कण-कण में भरकर हलचल, विकल भानु जो ताप मिली, सजल राज में राहु साया, शिथिल शशि अभिशाप मिली, बोल उठा पाठक– “ज्ञानी तब—अस्थि करों का ताप कहो, क्षण सिंधपति पर शाप कहो, क्षण रणधीरों का प्रताप कहो, कहो राह अरि आगम की, दल दानव का प्रसार कहो, अविराम कहो उस महासमर को, विस्मय रस विस्तार कहो।” किताब – सिंधपति दाहिर : 712 AD 🌿 Written by Rishabh Bhatt 🌿 ✒️ Poet in Hindi | English | Urdu 💼 Engineer by profession, Author by passion

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Echoes of 712 AD: The tragic hero of Sindh who stood against the storm.

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दूसरी स्मृति का आरंभ

सिंध विजय की अधूरी आकांक्षा ⚔️
नमस्कार प्रिय पाठकों! RishNova परिवार की ओर से आप सभी का इस ऐतिहासिक काव्य–श्रृंखला में स्वागत है। भारत, उस पश्चिमी दुनिया के लिए धीरे-धीरे एक ऐसी कठपुतली बनता चला गया, जिसकी डोरियाँ कहीं और से संचालित होती थीं। कभी यहाँ के ग्रंथ जलाकर इसकी सभ्यता को नष्ट करने का प्रयास किया गया, तो कभी इसके इतिहास को ही “Mythology” कहकर एक कल्पना मात्र सिद्ध करने की कोशिश हुई। समय के साथ हमारे अनेक नायक हमसे छीन लिए गए। जिन्होंने इस भूमि की रक्षा की, वे इतिहास के अंधेरों में खो गए, जबकि अनेक आक्रांताओं को हमारे इतिहास का केंद्र बना दिया गया। परिणाम यह हुआ कि यदि कोई भारत के इतिहास को जानना चाहे, तो उसे सबसे पहले तुगलकों, लोदियों, गौरियों, गजनवियों, खिलजियों और मुगलों से परिचित कराया जाता है। परंतु भारत का इतिहास केवल दिल्ली का इतिहास नहीं है।यह उतना ही विजयनगर, राष्ट्रकूट, चोल, पल्लव, सातवाहन, मेवाड़, सिंध और मराठों का भी इतिहास है। दुर्भाग्यवश जिन भारतीय राष्ट्रों को इतिहास के पन्नों में कम स्थान मिला, उनके नायक भी धीरे-धीरे स्मृतियों से लुप्त होते चले गए। दुख इस बात का है कि स्वतंत्रता के दशकों बाद भी हम मानसिक रूप से स्वतंत्र नहीं हो सके। हम आज भी अपने अनेक नायकों और उनके संघर्षों से अपरिचित हैं। शायद इसी कारण सिंध के सम्राट दाहिर, महारानी रानीबाई, सूर्या देवी और परमाल देवी जैसे नाम आज भी इतिहास की धूल में दबे हुए हैं। किन्तु इतिहास की कुछ स्मृतियाँ ऐसी होती हैं, जिन्हें समय पूरी तरह मिटा नहीं पाता। और अब वह प्राचीन पुस्तक पाठक को एक ऐसे युग में ले जाती है, जब अरब की धरती पर सामर्थ्य और महत्वाकांक्षा का साम्राज्य था। एक विशाल दरबार सजा हुआ था। खलीफा अपने वैभव के मध्य विराजमान था। सभा में अल-हज्जाज, मोहम्मद बिन कासिम और अनेक प्रभावशाली दरबारी उपस्थित थे। चारों ओर वैभव और मद का वातावरण था, किन्तु उस सभा में एक व्यक्ति ऐसा भी था, जिसके मन में असंतोष की अग्नि धधक रही थी। वह था—अल-हज्जाज। अरबों के अनेक प्रयासों के बाद भी सिंध उनकी पहुँच से बाहर था। यही विचार उसे भीतर ही भीतर व्याकुल कर रहा था। और अंततः उसने अपनी उस व्याकुलता को सभा के मध्य प्रकट किया... क्या थी वह व्याकुलता? क्यों सिंध अरब साम्राज्य की महत्वाकांक्षा का केंद्र बन चुका था? इन्हीं प्रश्नों का उत्तर प्रस्तुत करती है— द्वितीय स्मृति। •💬 अगर आपको यह कविता अच्छा लगा हो, तो नीचे कमेंट में अपनी राय जरूर बताइए। •📲 इसे अपने दोस्तों और परिवार के साथ भी शेयर कीजिए। •📚 ऐसी ही कविताएँ, कहानियाँ और ब्लॉग पढ़ने के लिए हमारी वेबसाइट से जुड़े रहिए। ✨ •🌸 आपके स्नेह के लिए धन्यवाद — Team RishNova
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