विभूतियाँ
Season–1राणा की तलवारें – महाराणा प्रताप को समर्पित
धर्मवादी रुढ़ियां जब अपने चरम उत्ताम पर–
पूरे भारत को बांधने में ससक्त थीं,
हवाओं का रुख भी स्वयं,
तलवारों की नोकों से मजबूर–
और जन्य भावना अव्यक्त थीं,
एक स्वतंत्रता ईश्वर को पाने की,
तो दूसरी ईश्वर बन जाने की,
एक स्वाभिमान पत्थर पर स्याही की,
तो दूसरी जिद, जिल-ए-इलाही की,
एक स्त्री के मर्यादा अधिकार की,
तो दूसरी आगरा के मीना बाजार की,
कहानी....जो अपने पन्नों पर रण के शिवाय
कुछ नहीं देख रही थी,
राज्य विस्तार और स्वराज्य अधिकार की लड़ाई में,
स्वाभिमान के शिवाय कुछ नहीं देख रही थी,
एक आताताई की जिद लाखों–
जुबानों पर भय बनकर आन पड़ी थी,
लेकिन फिर भी!
राणा की तलवारें निर्भय सीना तान खड़ी थीं।
🌿 Written by Rishabh Bhatt 🌿
✒️ Poet in Hindi | English | Urdu
💼 Engineer by profession, Author by passion
कविता के पीछे की भावना
राणा : युद्ध नहीं, चेतना इतिहास में कुछ युद्ध केवल राज्यों के बीच नहीं होते। वे विचारों के बीच होते हैं। एक ओर सत्ता का विस्तार होता है, तो दूसरी ओर स्वाभिमान का अस्तित्व। यह कविता उसी संघर्ष की अनुभूति से जन्मी है।
मेरे लिए महाराणा प्रताप केवल एक योद्धा नहीं हैं।
वे उस विचार के प्रतीक हैं, जो परिस्थितियों से हार सकता है, लेकिन झुक नहीं सकता। कविता की शुरुआती पंक्तियां —
धर्मवादी रुढ़ियां जब अपने चरम उत्ताम पर…यहां केवल धार्मिक संघर्ष की बात नहीं है। यह उस वातावरण का चित्रण है, जहां सत्ता और भय मिलकर समाज की स्वतंत्र चेतना को बांधने लगते हैं।
एक स्वतंत्रता ईश्वर को पाने की, तो दूसरी ईश्वर बन जाने की…इन पंक्तियों में कविता का मूल भाव छिपा है। एक ओर वह मन है, जो सत्य और स्वतंत्रता की तलाश में है। और दूसरी ओर वह सत्ता, जो स्वयं को अंतिम सत्य मान लेना चाहती है। इतिहास में अकबर को एक महान शासक के रूप में भी देखा जाता है, लेकिन इस कविता में मेरा केंद्र किसी व्यक्ति की प्रशंसा या आलोचना नहीं है। यह उस मानसिक संघर्ष का चित्रण है, जहां स्वराज्य और साम्राज्य आमने-सामने खड़े दिखाई देते हैं।
एक स्त्री के मर्यादा अधिकार की, तो दूसरी आगरा के मीना बाजार की…इन पंक्तियों में मैंने उस समय की दो विपरीत मानसिकताओं को दिखाने की कोशिश की है। एक ओर मर्यादा, संस्कृति और सम्मान की रक्षा का भाव, और दूसरी ओर शक्ति के प्रदर्शन का वैभव। कविता आगे बढ़ते-बढ़ते केवल युद्ध का वर्णन नहीं रह जाती। वह उस मनःस्थिति को दिखाती है, जहां हर दिशा में भय है, लेकिन फिर भी कुछ लोग झुकने से इंकार करते हैं।
लेकिन फिर भी! राणा की तलवारें निर्भय सीना तान खड़ी थीं…यही इस कविता की आत्मा है। महाराणा प्रताप का संघर्ष केवल मेवाड़ के लिए नहीं था। वह उस स्वाभिमान के लिए था, जो परिस्थितियों से बड़ा होता है। उन्होंने जंगलों में जीवन बिताया, कठिनाइयां देखीं, लेकिन आत्मसमर्पण नहीं किया। इस कविता को लिखते समय मेरा उद्देश्य केवल वीरता का वर्णन करना नहीं था। मैं उस चेतना को शब्द देना चाहता था, जहां मनुष्य अपने अस्तित्व, संस्कृति और सम्मान की रक्षा के लिए सब कुछ खोने को तैयार हो जाता है। शायद इसलिए “राणा की तलवारें” केवल हथियार नहीं लगतीं… वे स्वाभिमान की अंतिम लौ जैसी महसूस होती हैं। ⚔️ •💬 अगर आपको यह कविता अच्छा लगा हो, तो नीचे कमेंट में अपनी राय जरूर बताइए। •📲 इसे अपने दोस्तों और परिवार के साथ भी शेयर कीजिए। •📚 ऐसी ही कविताएँ, कहानियाँ और ब्लॉग पढ़ने के लिए हमारी वेबसाइट से जुड़े रहिए। ✨ •🌸 आपके स्नेह के लिए धन्यवाद — Team RishNova
☀️ आदर्शों के अन्य अमर दीप

Great poem... heart'touching ❤️❤️❤️❤️❤️❤️❤️
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