उर्दू नज़्में
Season–3बरसात की बूंदें आईं
क्या कहेगी दुनिया, क्या ही कहेगा समाज?
मैं तेरा हूँ बनके आया, तू बन जा मेरी आज,
एहतियात चालों में, रख सफ़र को तेरा नाम,
भटके कई मुसाफिर, कई भूल गए अंजाम,
बिन बात खिली फुलझडियां, पत्तें लीं अंगड़ाई,
तुम्हें डूबाने को मुझमें, हैं बरसात की बूंदें आईं,
ये होंठ दबी दांतों में, है कातिल तेरी अदाई,
तुम्हें डूबाने को मुझमें, हैं बरसात की बूंदें आईं।
मैं तुझको करता हूँ मैसेज, रात में छत पे भाग,
बातें मेरी सुनके घर का, जाए न कोई जाग,
याद में तेरी कटती है यारा, मेरी सारी रात,
तू सो जाती है कहके, जब ‘अभी मैं करती बात’,
ढूंढ रही थी सदियों से, हर बूंद कोई हुस्नाई,
तुम्हें डूबाने को मुझमें, हैं बरसात की बूंदें आईं,
तेरी हामी भरती हैं, पलकें झुकी हुई शरमाई,
तुम्हें डूबाने को मुझमें, हैं बरसात की बूंदें आईं।
तारें कदमों में रख दूँ, ला आसमान से सारा,
हो बाहों में भरने का, इकलौता तेरा इशारा,
तू रूह है मेरी, मैं तेरा चलता साया,
इंतज़ार में अबतक, था कितने सावन भरमाया,
तलाश मेरी ये आखि़र, ढूंढ ही तुझको लाई,
तुम्हें डूबाने को मुझमें, हैं बरसात की बूंदें आईं,
इश्क़ जताने को यारा है पकड़ी तेरी कलाई,
तुम्हें डूबाने को मुझमें, हैं बरसात की बूंदें आईं।
🌿 Written by Rishabh Bhatt 🌿
✒️ Poet in Hindi | English | Urdu
💼 Engineer by profession, Author by passion
Author's Note
हर रचना के पीछे की छोटी-सी कहानी कुछ वक़्त पहले मेरी मुलाक़ात एक लड़की से हुई थी। पहली बार मिले, थोड़ी देर साथ घूमे, बातें कीं, हँसे... और पता ही नहीं चला कि कब वो मुलाक़ात यादों में जगह बना गई। बातों-बातों में उसे पता चला कि मैं लिखता हूँ। उसने अचानक मुझसे पूछा—
"Suppose... बाहर बारिश हो रही हो, हम दोनों साथ हों, पूरा scene एकदम romantic हो... तब तुम क्या लिखोगे?"
सच कहूँ तो मैंने पहले से कुछ नहीं सोचा था। लेकिन उसका सवाल सुनते ही, बिना एक सेकंड लगाए, मेरे मुँह से बस एक ही लाइन निकली—
“तुम्हें डूबाने को मुझमें, हैं बरसात की बूंदें आईं...”
मैंने उसे देखा, वो मुस्कुरा दी। मैंने हँसकर कहा, "बाकी Instagram पर भेज दूँगा।" करीब दो दिन बाद मैंने इस नज़्म का अगला हिस्सा लिखा और उसे भेज दिया—
मैं तुझको करता हूँ मैसेज, रात में छत पे भाग, बातें मेरी सुनके घर का, जाए न कोई जाग, याद में तेरी कटती है यारा, मेरी सारी रात, तू सो जाती है कहके, जब 'अभी मैं करती बात'...और फिर...
तेरी हामी भरती हैं, पलकें झुकी हुई शरमाई, तुम्हें डूबाने को मुझमें, हैं बरसात की बूंदें आईं।उसने इसे पढ़ा... और उसकी एक "बहुत अच्छा लिखा है" ने शायद इस नज़्म को अधूरा नहीं रहने दिया। उसके बाद शब्द अपने-आप जुड़ते चले गए। एक मुखड़े से शुरू हुई बात, धीरे-धीरे पूरी नज़्म बन गई। आज वही नज़्म, बिना कुछ बदले हुए एहसासों के साथ, आपके सामने है। अगर ये शब्द आपको connect कर पाए हों, तो नीचे comment में अपनी राय या अपना अनुभव ज़रूर लिखिए। 💬 और अगर आपको लगा कि ये किसी अपने तक पहुँचना चाहिए, तो बिना सोचे share कर दीजिए। ❤️ हर Friday RishNova पर कुछ नया पढ़ने ज़रूर आइए... अगला ब्लॉग शायद आपका favourite बन जाए। ✨
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