दिव्य भक्ति संग्रह
Shree Ganesh Specialमैं गाता तुम्हें—गणेश वंदना
प्रसाद अनुराग का हूँ चढ़ता तुम्हें,
मैं गाता तुम्हें... प्राण दाता तुम्हें,
भौरों सा करने भ्रमण उर जाता तुम्हें,
मैं गाता तुम्हें... प्राण दाता तुम्हें।
मलिन मन मधुरता में मिलाई मेरी,
मयंक मनोहर छवि नैनों ने पाई तेरी,
समागम संसार का उदरधर तुम्हारे,
पकड़ लेते बनवारी कोई जब भी हारे,
अश्रु के क्षारों से हूँ तिलक लगता तुम्हें,
मैं गाता तुम्हें... प्राण दाता तुम्हें,
जो भी हृदय में मेरे, सब बताता तुम्हें,
मैं गाता तुम्हें... प्राण दाता तुम्हें।
अजब सी थिथर सी उठी, तन वितर,
ज्वाला से पिघला, लिया हिम ने जकड़,
मैं आया, आया तेरे द्वार सिद्धि विनायक,
रखी लाज मेरी हे बने तुम सहायक,
भजूं विघ्नहर्ता, हूँ शीश नवाता तुम्हें,
मैं गाता तुम्हें... प्राण दाता तुम्हें,
अनकहे भाव से हूँ सब जताता तुम्हें,
मैं गाता तुम्हें... प्राण दाता तुम्हें।
अक्षर प्रिय रोम–रोम में तूने ऐसी लिखी,
मैंने दर्पण में देखा छवि तुम्हारी दिखी,
इस जगत में क्या है भला इतना सजीला?
कर सके जो तुम्हें छोड़, नेत्र को गीला,
अपने इसी प्रेम भाव से हूँ भीगता तुम्हें,
मैं गाता तुम्हें... प्राण दाता तुम्हें,
हे गौरी–गणेश, श्री मुकुट, विधाता तुम्हें,
मैं गाता तुम्हें... प्राण दाता तुम्हें।
नश्वर इस तन का है अस्तित्व कितना?
मेरे तुच्छ प्राण की कीमत, कीट ही जितना,
फिर भी विवशता से सारी निकाला मुझे,
मैं जब गिरा, देवा! तूने सम्हाला मुझे,
निःसंशय मगन मन पथ को जाता तुम्हें,
मैं गाता तुम्हें... प्राण दाता तुम्हें,
मेवा, मिश्री नहीं, स्नेह हूँ खिलता तुम्हें,
मैं गाता तुम्हें... प्राण दाता तुम्हें।
हे विधाता तुम्हें... हे विधाता तुम्हें।
🌿 Written by Rishabh Bhatt 🌿
✒️ Poet in Hindi | English | Urdu
💼 Engineer by profession, Author by passion
विघ्नहर्ता का आगमन
इस गणेश पूजा बप्पा के आशीर्वाद से महके आपका जीवन नमस्ते प्यारे पाठकों!
गणेश पूजा के इस पावन और भक्तिमय माहौल में, आज हम आपके लिए कोई साधारण लेख नहीं, बल्कि सीधे दिल से निकली एक अत्यंत भावपूर्ण कविता लेकर आए हैं। यह कविता एक भक्त के समर्पण, उसकी विवशता और विघ्नहर्ता के प्रति उसके अटूट विश्वास की एक सजीव तस्वीर है।
आइए, इस सुंदर रचना के गहरे भावों को महसूस करते हैं और बप्पा की भक्ति में डूब जाते हैं।
प्रसाद अनुराग का हूँ चढ़ता तुम्हें, मैं गाता तुम्हें... प्राण दाता तुम्हें...कवि यहाँ बप्पा को किसी भौतिक वस्तु का नहीं, बल्कि अपने 'अनुराग' यानी सच्चे प्रेम का प्रसाद चढ़ा रहा है। जब जीवन में हर तरफ से हार मिलती है, तब 'बनवारी' (बप्पा) आकर थाम लेते हैं। यहाँ भक्त अपने आँसुओं के खारेपन से बप्पा का तिलक करता है और अपने दिल की हर बात उन्हें बेझिझक बताता है।
मैं आया, आया तेरे द्वार सिद्धि विनायक, रखी लाज मेरी हे बने तुम सहायक...जब जीवन की कठिन परिस्थितियाँ इंसान को भीतर से तोड़ देती हैं—जैसे कोई ज्वाला में पिघलकर बर्फ में जकड़ गया हो—तब 'सिद्धि विनायक' का द्वार ही एकमात्र सहारा बनता है। बप्पा अपने भक्त की लाज रखते हैं, उसके सहायक बनते हैं और उसके सारे विघ्न हर लेते हैं।
इस जगत में क्या है भला इतना सजीला? कर सके जो तुम्हें छोड़, नेत्र को गीला...बप्पा का रूप इतना सजीला और मनमोहक है कि जब कोई भक्त आईने में देखता है, तो उसे खुद में भी बप्पा की ही छवि नज़र आने लगती है। यह प्रेम की वो पराकाष्ठा है जहाँ आँखों से बहने वाले आँसू भी ख़ुशी और भक्ति के रस में भीग जाते हैं।
मेवा, मिश्री नहीं, स्नेह हूँ खिलाता तुम्हें,मैं गाता तुम्हें... प्राण दाता तुम्हें।इस नश्वर संसार में इंसान का अस्तित्व एक छोटे से कीट जैसा तुच्छ हो सकता है, लेकिन बप्पा की करुणा असीम है। जब भी भक्त गिरता है, देवा उसे संभाल लेते हैं। इसलिए, भक्त उन्हें छप्पन भोग या मेवा-मिश्री नहीं, बल्कि अपने शुद्ध 'स्नेह' (प्रेम) का भोग लगाता है। अंतहीन भक्ति का सार यह कविता हमें सिखाती है कि बप्पा को रिझाने के लिए बड़े-बड़े आयोजनों की नहीं, बल्कि एक साफ़ दिल और अनकहे भावों की ज़रूरत होती है। जब हम अपनी सारी विवशताओं को उनके चरणों में सौंप देते हैं, तो वह 'विधाता' हमारे जीवन की नैया को पार लगा ही देता है। गणपति बप्पा मोरया! मंगल मूर्ति मोरया! अगर ये ब्लॉग आपके दिल को थोड़ा भी छू पाया हो, तो नीचे comment में अपनी feeling ज़रूर share कीजिए। 💬 इसे अपने दोस्तों के साथ भी share करें, हो सकता है किसी को आज इसी की ज़रूरत हो। ❤️ और हाँ, हर Friday RishNova पर एक नया ब्लॉग आपका इंतज़ार करता है, इसलिए अगली मुलाक़ात miss मत कीजिए। ✨
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