Ranaghosh 📯⚔️ – Rishabh Bhatt | Sindhpati Dahir : 712 AD

सिंधपति दाहिर : 712 ई॰

चौथी स्मृति

रणघोष

उचित अनुचित का ज्ञान न, अरि वात्सना का दास है, दरबारियों, देखा लो! सूचना में शत्रु के अज्ञानता का वास है, देखता है अंध भी इंद्री भावों के जगा, पर खो गया अरि कल्पना में, सत्य, धीरज डगमगा, जागता है स्वान भी, रात्रि आंखों को लगा, पर सो रहा अरि कामना के भाव उर में जगमगा, सत्य है! नाश ही छाया जो कर रहा हुंकार है, बुद्धि का संयम जला बनता सुगम, धिक्कार है! साथियों! रण को उठा लो भाल तुम, देखना है शत्रु में साहस कोई या फिर क्षणिक उत्तेजना है! जुगनुओं में प्यास है सुरज निगलने की आज तो, बता दो! सिंध की भावी प्रबलता मुत्मइन आवाज को। गूंज फिर छाने लगी पूरे सभा में दर्जनों, बोला वहीं से एक फिर सिंध के सरदारों सुनों, महराज हैं आसित यहीं उनसे तनिक आदेश लो, संगर चलो होकर सजग यूं ही नहीं आवेश खो, शत्रु है ग्रसित अगर रण की उसे क्षण प्यास है, भर दो महीं तल रक्त से, वीरों चलों! उल्लास है, लिख दो नया इतिहास तुम, देखो जरा उपहास तुम, अरि बोलता मिथ्या नई, कुम्भिल स्वयं, कहता कोई, उसको तनिक न ज्ञान है! या जानकर अनजान है? अज्ञानता के द्वार में, व्यर्थ के हुंकार में, बोलता होगा समर, तो बात ये कर दो अमर, वीरों चलों! संगर चलो! रण की प्रभा बनकर जलों, लिख दो नई वेदी समर की, इच्छा यही आठों पहर की, भिक्षा यदि अरि मांगता, करुणा ह्रदय में जागता, पर मांगता है शत्रु वो, सम्भव नहीं है स्वप्न जो, भूपति करें आदेश अब, रण की लिखें संदेश तब, शोभा नई आए निखर, लिखकर अमर-संगर-प्रखर। सुनकर सभी को ध्यान से, उठकर खड़े हो मान से, बोलें स्वयं राजन, सुनो! भू की प्रभा प्यारे जनों, गौरव हमारे धर्म में है, याचना के सत्कर्म में है, याचक यदि आया यहां, सुदूर से कुछ लाया यहां, शंका ह्रदय में पल रही है, प्रतिशोध बन जो जल रही है, उसका सरल संदेश दो, बीते हुए सब द्वेष को, घटना यही न! क्षति हुई, धन भी लुटें, दुर्गति हुई, व्यापारों से व्यापारी डोलें, खुली आंख से बरसे शोले, गिरा समंदर में प्याला, सागर में फैली मधुशाला, लुटीं मणि की मृदु मालाएं, आजाद हुईं साकी बालाएं, भोग-विलासी प्यास गएं, चोरों के संग संग दास गएं, कारण इन सबको अरि माने है, वो सिंधीं लुटेरे जाने है, मिथ्या पर मिथ्या फूटें, अरमानों पर पानी छूटें, तब आया करने को रण गर्जन, शब्दों में ज्वाला के तर्जन, मांगे तो मैं भिक्षा दूं, पर न यह माटी की इच्छा दूं, सकल सभा में ललकार धरूं, अरि कायरता पर धिक्कार करूं, मिथ्या सी बातों में छिपकर, लालच की अग्नि में धिक-धिक कर, मांग रहा इस स्वर्ग चिड़ी को, पूरब की दीपकली को, वर्षों से रण में हारा है, फिर भी रण ही उसको प्यारा है, हम प्रेम लुटाते चलते हैं, पौरुष की शाखा में पलते हैं, हम विश्व विजेता हैं उर के, अनुराग अमर के, प्रेम प्रखर के, हम दानी हैं, ज्ञानी हैं, हम गंगा की निर्मलता के पानी हैं, निर्मल मन की बात सुनो, हे अरब देश के भ्रात जनों, सागर में चोरी तुम जानों, अज्ञानी मन को भी पहचानों, चोर, लुटेरे, अरबी सेना, सिंध से न कोई लेना-देना, बात यहीं यह ख़त्म करो, धावक को भी विदा करो, फिर जय बोले सब काली की, ऊषा में फैले उजियाली की, जय बोलें काल-कपाली की, जय-जय हो खप्पर वाली की। गई बात यह अरब देश को, उठा ख़लीफा लिए क्लेश को, बोला– मेरी बातों को धिक्कार करे, वो सिंधपति प्रतिकार करे, खाता हूँ कसम ख़ुदा की, तोड़ूंगा यह घमण्ड मृदा की, नश-नश की लहू को पानी कर दूंगा, जन-जन की लाश जवानी कर दूंगा, माटी के मतवाले माटी में जाएंगे, तलवारों से यह प्यास बुझाएंगे, मीर उठो! मेरे राजा, खोलो जन्नत जाने का दरवाजा, मौला को काफिर टोली दे दो, पूरब को खूनी होली दे दो, रण जाने की कर लो तैयारी, है इम्तिहान की तेरी बारी, विजय पताका लहरा दो तुम, जज्बा जेहाद का फहरा दो तुम, जाओ क्षण-भर विश्राम करो, फिर संगर को प्रस्थान धरो, खुदा सलामती तुमको बक्छें, तुम्हीं मसीहा सबसे अच्छे। किताब – सिंधपति दाहिर : 712 AD 🌿 Written by Rishabh Bhatt 🌿 ✒️ Poet in Hindi | English | Urdu 💼 Engineer by profession, Author by passion

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Echoes of 712 AD: The tragic hero of Sindh who stood against the storm.

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प्रस्तुत है चौथी स्मृति

युद्ध की भूमिका 🔥
नमस्कार प्रिय पाठकों! RishNova परिवार की ओर से आप सभी का इस ऐतिहासिक काव्य–श्रृंखला में हार्दिक अभिनंदन। हमारी पिछली स्मृतियों को आपने जो असीम स्नेह दिया, उसके लिए हम दिल से आभारी हैं। इसी सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए, आज पेश है हमारी चौथी स्मृति— रास्ते में और बाज़ार में अपने धन की रक्षा की व्यवस्था मनुष्य को स्वयं ही करनी पड़ती है (ऋ॰ 1/112 सूक्त)। यह एक ऐसा सिद्धांत है जो प्राचीन काल से लेकर आज की इक्कीसवीं सदी तक समान रूप से सत्य है। जिसकी वस्तु है, उसकी सुरक्षा का उत्तरदायित्व भी उसी का होता है। किन्तु यह बात उन अरब शासकों को कौन समझाता? कहा भी जाता है कि जब राजसत्ता और धर्मसत्ता एक हो जाती हैं, तब शासन प्रायः तानाशाही की ओर बढ़ने लगता है। उस समय की अरबी शासन व्यवस्था में भी यह प्रवृत्ति स्पष्ट दिखाई देती है। धार्मिक विस्तारवाद और राजनीतिक प्रभुत्व की इच्छा से प्रेरित होकर वे निरंतर नए क्षेत्रों की ओर बढ़ रहे थे। इसी बीच सिंध के समुद्री क्षेत्र में एक अरबी व्यापारिक जहाज समुद्री लुटेरों द्वारा लूट लिया गया। इस घटना को आधार बनाकर इराक के शासक हज्जाज ने तत्कालीन खलीफा की अनुमति से सिंध पर आक्रमण की योजना बनानी आरम्भ कर दी। यद्यपि यह इस संघर्ष का एक कारण था, किन्तु इसके पीछे एक दूसरा महत्वपूर्ण कारण भी विद्यमान था। उन दिनों ओमान क्षेत्र में माविया बिन हारिज अल्लाफी तथा उसके भाई मोहम्मद बिन हारिज अल्लाफी ने खलीफा के विरुद्ध विद्रोह कर दिया था। चचनामा के अनुसार मोहम्मद अल्लाफी ने मकरान में शरण ली थी, जो उस समय सिंध के प्रभाव क्षेत्र में आता था। शरण में आए व्यक्ति की रक्षा करना भारतीय परम्परा का प्राचीन धर्म रहा है। महाराज दाहिर ने भी इसी परम्परा का सम्मान किया और उसे संरक्षण प्रदान किया। यही कारण था कि अरबों की दृष्टि में सिंध पहले से भी अधिक खटकने लगा था। अब समुद्री लूट की घटना उन्हें एक उपयुक्त बहाना प्रदान कर चुकी थी। इसी आधार पर उन्होंने सिंध के राजदरबार में एक कठोर और धमकीपूर्ण संदेश भेजा। (इतिहास के अनुसार इस घटना के पश्चात हज्जाज ने सेनानायक उबयदुल्लाह के नेतृत्व में सिंध पर प्रथम आक्रमण किया, जिसमें उसे पराजय का सामना करना पड़ा और वह युद्धभूमि में मारा गया। इसके बाद बुठैल के नेतृत्व में दूसरा आक्रमण किया गया, किन्तु उसका परिणाम भी अरबों के लिए वैसा ही रहा। अंततः तीसरे प्रयास में हज्जाज ने अपने सत्रह वर्षीय दामाद मोहम्मद बिन कासिम को सिंध विजय के लिए भेजा। इस खण्डकाव्य में मोहम्मद बिन कासिम का उल्लेख ‘मीर कासिम’ के रूप में किया गया है तथा उबयदुल्लाह और बुठैल के अभियानों का वर्णन नहीं किया गया है। इसके लिए पाठकों से विनम्र क्षमा याचना, किन्तु यह एक कवि की साहित्यिक स्वतंत्रता भी है।) जब वह संदेश दरबार में पढ़कर सुनाया गया, तो सभा में उपस्थित सभी दरबारियों का रक्त उबाल मारने लगा। उन्होंने एक-एक कर अरबों को उनकी पूर्व पराजयों की याद दिलानी शुरू कर दी। किसी ने 644 ईस्वी के संघर्ष का स्मरण कराया, किसी ने 659 ईस्वी, 662 ईस्वी और 664 ईस्वी के असफल अभियानों का। प्रत्येक व्यक्ति अपने-अपने ढंग से अरबों की इस गीदड़भभकी का उत्तर दे रहा था। महाराज दाहिर शांत भाव से सभी की बातें सुन रहे थे। जब सभी अपने विचार व्यक्त कर चुके, तब उन्होंने अपना मत प्रकट किया। उनके शब्द केवल एक राजा के शब्द नहीं थे, बल्कि उन सनातन आदर्शों की अभिव्यक्ति थे जिन पर वैदिक संस्कृति का आधार टिका है। वेदों की संस्कृति ही आर्य संस्कृति है। वैदिक समाज ही आर्य समाज है। यही आग्नेय संस्कृति है, यही उदात्त संस्कृति है। यही सनातन है, अतः शाश्वत है; यही निरंतर है और यही भारत की आत्मा है। महाराज दाहिर ने उसी आत्मा को स्वर देते हुए जो उत्तर दिया, वही इस खण्डकाव्य की चौथी स्मृति के रूप में प्रस्तुत है। •💬 अगर आपको यह कविता अच्छा लगा हो, तो नीचे कमेंट में अपनी राय जरूर बताइए। •📲 इसे अपने दोस्तों और परिवार के साथ भी शेयर कीजिए। •📚 ऐसी ही कविताएँ, कहानियाँ और ब्लॉग पढ़ने के लिए हमारी वेबसाइट से जुड़े रहिए। ✨ •🌸 आपके स्नेह के लिए धन्यवाद — Team RishNova
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