Deval Ka Raktpaat 🩸⚔️ – Rishabh Bhatt | Sindhpati Dahir : 712 AD

सिंधपति दाहिर : 712 ई॰

पांचवी स्मृति

देवल का रक्तपात

आंखों में आंधी तूफान लिए, अरबों की सेना सिंध चली, अश्व-बलिस्ते रण मर्दन करतीं, संग-संग उनके हिंद चलीं, बाणों में खूनी प्यास लिए, तरकस से नरभक्षी राह उठी, संतानों की लाशों पे रोती, धरती, वर्षों-वरस कराह उठी, चारों ओर गूंज एक ही, एक ही नारा अल्लाह उठें, हूं हूं कर तलवारों की, प्यासी पथराई बांह उठे, कण-कण में चित्कार उठे, हय मस्त मतंग हुंकार उठे, गर्म हवा में लू लपटों की, चम चम चमके, तलवार उठे, ऐसी भारी सेना के संग, अरि सीमा पर डाला बेड़ा, लिए बगावत के सुर को, बौद्धों ने भी रण को छेड़ा, जा पहुंचे, मिल गएं, एक पल में भूल धरा के कर्ज सभी, गुट-गुट में पहुंचे इधर-उधर से, बन करके मर्ज सभी, अब मर्दन करने को मुर्दों पर, काल भयंकर तैयार हुई, चपला सी तड़ तड़ करती, छवि हथियारों की खूंखार हूई। करने को संबोधन, कासिम! सैन्य सिविर में आगे आया, भय से उसके, पूरे दल में, मानों मातम सा छाया, सत्रह वर्ष का, किन्तु– उसमें राक्षसी प्रवृत्ति थी भारी, बोला– सागर में मछली सम, लाशों के बहने की बारी, अल्लाह के बंदो, सुन लो! सिंध द्वार है आगे बढ़ने का, इस्लाम सहित स्वर्णिम युग में, गिरि-गढ़ चढ़ने का, यह विजय नहीं सीमा की, मजहब के सूर्य चमकने की, काफ़िर की बलि चढ़ाकर, जन्नत तक पहुंचने की, यह विजय नहीं कामना की, हृदय काम के बुझ जाने की, सुन्दरियों, बालाओं को पी-पी कर, उर की प्यास बुझाने की, यह विजय नहीं धन दौलत की, स्वयं रत्न बन जाने की, स्वप्नों के शीशमहल को, कटे शीष पर बनवाने की, यह विजय नहीं चैतन्य तेज की, कुटिल नीति अपनाने की, जन-जन की लाशों पर चढ़कर, विजय-गीत-गुण गाने की, यह विजय नहीं ऐश्वर्य-राज की, अरबों के अपमान चुकने की, इस्लाम विजय दिखलाने की, अल्लाह को शीष नवाने की, यह विजय रोम-रोम में घुल जाए, खर-खंजर शोणितमय धुल जाए, रक्त बीज से विजय हमारी, ध्रुव-ध्रुव तक मिल जाए, चलो बढ़ो आगे! चलो बढ़ो आगे! साथियों! बढ़ो आगे, बिकराल रूप ढ़ाले, गिरि-गिरि पर चढ़ो! तुम बढ़ो आगे। सत्य ही, मृदु शादों पर, चरण दंभ के पड़ जाते हैं, सरसीरुह के लोचन में, भौरों के भिन-भिन मचलाते हैं, सौन्दर्य-गर्वित-सरिता में, पावक मद की जलती है, आप आप ही भाप स्वयं बन, जल को भी छलती है, जग मुरझाया, जैसे वृक्षों के– पतझड़ में पत्ते छूटें, कामातुर उर में प्यास लिए, दुर्जन अरि के सैनिक टूटें, निःशस्त्र जनों पे, नाकारे– अरबों ने धूर्त चढ़ाई की, कासिम की निगरानी में, इक धर्म जेहादी लड़ाई की, पर पौरुष की भूमि पर, शेरों के छाती ही पलते हैं, सुन बैरी के पैरों की आहट, बच्चों के भी खून उबलते हैं, वक्ष जवानों के तन जाते हैं, ले-ले-हर-हर की बोली, कर-कर में खंजर भर, चल पड़ती है महिलाओं की टोली, पीने को खप्पर, काली की रुप भयंकर दिख जाती है, रक्त दुधारू पी-पी कर, तलवारें ताण्डव उग्र दिखाती हैं। हा! ऊषा की मृदु पलकों पर, छल-छल छलकी, शोणितमय पानी, हह-हहा उठी पल भर में, देवल की शान्त जवानी, प्रथम प्रहार, देवल की उजियारी, देवालय की चोटी पर, द्वितीय में पंडित, कहीं पुरोहित, कहीं पुजारी की रोटी पर, तृतीय में, जन-जन की लाश बही, मारुत के संग-संग सर-सर, गिरें, गगन से बूंद गिरी हो, झरनों के सम झर-झर, दो टूक कलेजे के, वे पल भर में, टुकड़े चार हो गएं, चैतन्य स्वास से छूरी-खंजर, एक-एक कर पार हो गए, चौथे में, लोहू से लिथरातीं, कटीं-छटीं बस लाशें, लुत्थम-लुत्था जूझ रहीं हों, दीमक सम पीने को लाशें, हा विधना! हा, ऐसी बलि, वेदी ने शायद देखी होगी, चर-चर चर-चर नशें चबातीं, लोहू से कृपाणें भीगीं होंगी, कुशा लाल, महि-शून्य अकाल, हा विधना! हा, ऐसी मायाजाल, तन-तन के फाड़ उदर को, निकलें अरि के भीषण भाल, महज़ चंद पलों में, देवल लाशों की श्मसान हो गई, लड़ सकीं लड़ी तब तक सांसें, जब तक न निष्प्राण हो गईं, जैसे पिघल गई, हिम गिरि से, इधर लाश हा उधर लाश, बस, प्राण किशोरी रही शेष बनने को अरबी दास, दो चार पहर बीतें, फिर हो गया, उस रंगमंच का सम्पूर्ण अंत, मानवता की काया में लिख गई, देवल युग-युग तक व्यथा भ्रंत। किताब – सिंधपति दाहिर : 712 AD 🌿 Written by Rishabh Bhatt 🌿 ✒️ Poet in Hindi | English | Urdu 💼 Engineer by profession, Author by passion

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Echoes of 712 AD: The tragic hero of Sindh who stood against the storm.

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पांचवी स्मृति में...

जब देवल की धरती पर युद्ध ने अपना पहला रक्तरंजित अध्याय लिखा 🩸
नमस्कार प्रिय पाठकों! RishNova परिवार की तरफ से इस ऐतिहासिक काव्य–श्रृंखला में पधारे सभी पाठकों का स्वागत है। अब तक की स्मृतियों को मिले आपके स्नेह के प्रति हम कृतज्ञता व्यक्त करते हैं। आज सादर सेवा में प्रस्तुत है पांचवी स्मृति— ‘एकम् सद् विप्रा बहुधा वदन्ति’ (ऋ॰ 1.164.46) अर्थात् सत्य एक ही होता है, किन्तु विद्वान उसे अनेक प्रकार से व्यक्त करते हैं। सम्राट दाहिर का इतिहास भी ऐसा ही एक सत्य है—एक महान सत्य। उसे कहने वाले भिन्न हो सकते हैं, उसे प्रस्तुत करने के तरीके अलग हो सकते हैं, किन्तु उसके अस्तित्व और उसके गौरव को नकारा नहीं जा सकता। दुर्भाग्य से इस इतिहास को जिस प्रकार गुमनामी के अंधकार में धकेला गया, वह केवल एक व्यक्ति या एक राजा के साथ नहीं, बल्कि सम्पूर्ण आर्यावर्त के ऐतिहासिक स्मृति-बोध के साथ किया गया अन्याय है। इस अन्याय की शुरुआत ऐसे व्यक्ति से हुई जिसने न तो भारत की किसी भाषा को समझा था और न ही कभी भारत को अपनी आँखों से देखा था। उसका नाम था जेम्स मिल। उसकी पुस्तक हिस्टरी ऑफ ब्रिटिश इंडिया आगे चलकर भारतीय इतिहास के अध्ययन और लेखन का एक प्रमुख आधार बन गई। इसके परिणामस्वरूप भारत ने अपने असंख्य नायकों को इतिहास के पन्नों में खो दिया। वेदों की प्रतिष्ठा और वैदिक परम्पराओं की समझ भी धीरे-धीरे संघर्ष का विषय बनती चली गई। दुर्भाग्यवश आज भी अनेक इतिहासकार प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उसी दृष्टिकोण के प्रभाव में दिखाई देते हैं। ऋग्वेद (7.41.1) में प्रातःकाल अग्नि, इन्द्र, वरुण, भग, सोम और रुद्र देवों की स्तुति का उल्लेख मिलता है। सिंध के देवल क्षेत्र में स्थित एक भव्य शिव मंदिर में प्रतिदिन ऐसा ही दृश्य देखने को मिलता था। प्रत्येक प्रभात वहाँ भगवान शिव की आराधना के लिए जनसमूह उमड़ पड़ता था। यह मंदिर केवल देवल का ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण सिंध का एक प्रतिष्ठित और पूजनीय तीर्थ था। स्वयं महाराज दाहिर भी समय-समय पर वहाँ शिव आराधना हेतु उपस्थित होते थे। मंदिर के ऊँचे शिखर पर लहराता हुआ भगवा ध्वज उसके दिव्य वैभव को और भी अलौकिक बना देता था। जनमानस में यह विश्वास था कि जब तक वह ध्वज मंदिर के शिखर पर फहराता रहेगा, तब तक कोई भी शक्ति सिंध को पराजित नहीं कर सकेगी। लोगों की श्रद्धा थी कि सम्पूर्ण सिंध की रक्षा स्वयं भगवान शिव कर रहे हैं। उधर दूसरी ओर, शाह हज्जाज के आदेश पर मोहम्मद बिन कासिम लगभग पंद्रह हजार सैनिकों के साथ सिंध की ओर बढ़ चुका था। मार्ग में उसे मकरान के शासक मोहम्मद हारून से अतिरिक्त सैनिक सहायता प्राप्त हुई। साथ ही पाँच विशाल बलिस्ते भी उसे प्रदान किए गए, जिनकी सहायता से दूर तक बड़े पत्थर फेंके जा सकते थे। सिंध की सीमा के निकट पहुँचते-पहुँचते अब्दुल-असमद-जहाँ के नेतृत्व में एक और सैन्य दल उससे आ मिला। इस प्रकार उसकी सेना पहले से कहीं अधिक विशाल और सशक्त हो चुकी थी। इसी काल में कुछ विश्वासघात की घटनाओं का भी उल्लेख मिलता है। चचनामा के अनुसार कुछ लोगों ने शत्रु को ऐसी जानकारियाँ उपलब्ध कराईं जिनसे उसे लाभ पहुँचा। इन्हीं घटनाओं के बीच किसी ने देवल के शिव मंदिर से जुड़ी उस मान्यता और उसके रहस्य की सूचना भी शत्रु पक्ष तक पहुँचा दी। फलस्वरूप मोहम्मद बिन कासिम ने अपनी समस्त शक्ति के साथ देवल पर आक्रमण कर दिया। युद्ध की विभीषिका में मंदिर का ध्वज गिरा दिया गया और मंदिर को भी भारी क्षति पहुँची। इसके बाद देवल की धरती पर ऐसा रक्तपात हुआ जिसने पूरे क्षेत्र को स्तब्ध कर दिया। नगर की गलियाँ, घर, मंदिर और चौक युद्ध की ज्वाला में घिर गए। कुछ ही समय में देवल का शांत और समृद्ध जीवन एक भीषण त्रासदी में बदल गया। एक पहर के भीतर देवल की धरती लहूलुहान हो चुकी थी।कैसा था वह दृश्य? कैसी थी वह पीड़ा, वह संघर्ष और वह विनाश? इसी हृदयविदारक प्रसंग का शब्द-चित्र इस खण्डकाव्य की चौथी स्मृति में प्रस्तुत है। •💬 अगर आपको यह कविता अच्छा लगा हो, तो नीचे कमेंट में अपनी राय जरूर बताइए। •📲 इसे अपने दोस्तों और परिवार के साथ भी शेयर कीजिए। •📚 ऐसी ही कविताएँ, कहानियाँ और ब्लॉग पढ़ने के लिए हमारी वेबसाइट से जुड़े रहिए। ✨ •🌸 आपके स्नेह के लिए धन्यवाद — Team RishNova
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