महारानी पद्मिनी की जौहर गाथा
भाग–2रणधीरों की गर्जना ⚔️
गज गर्जन सा संबोधन था, रावल गढ़ के रणधीरों का,
दामिनी सी चम चम करती, असि हाथ लिए महिवीरों का,
एक एक रावल योद्धा खड़ा हुआ, बन पर्वत राज हिमालय था,
गढ़ का कोना कोना गृह था, तीर्थ वहीं, देवालय था,
चकाचौंध आंखों में अरि की, निकले रश्मि कृपाणों से,
कपट लिए निकला उर में, विजय मिले न बाणों से,
अतिथि सत्कार चाहता हूँ, ये हांथ नहीं रण प्यासी,
अरूण प्रिया का व्याख्यान सुना था, हूँ दर्शन का अभिलाषी,
अतिथि रूप में खिलजी आया, रीति ने भुज बांध लिया,
एक किरण महारानी का फिर, था दर्पण ने पार किया,
जाने से पहले ही एक वांछा, अब मिले मुझे भी अवसर,
छल की जंजीरों ने जकड़ा भूपति को, लिए चला अपने कर,
फिर एक संदेशा भेजा गढ़ को, कायरता पर अभिमान किए,
मांग पद्मिनी की करता, तभी रतन के प्राण जिए,
चांद देखती वातायन से रानी, क्या कुल की मै एक बला हूँ,
सुन्दरता पति पर भारी, क्या सच में मै अबला हूँ,
हाय विधाता! पथ दिखलाओ, मै भी सावित्री बन जाऊं,
अरि के कर को खंडित कर, अपने पति को मै लाऊं,
फिर बनी भवानी चली पद्मिनी, ले घूंघट दरबार जहां पर,
रण गर्जन में देरी क्यों, है रणधीरों की तलवार कहां पर,
एक संदेशा भेजो अरि को, स्वीकार करे तो मै आऊं,
अपने साथ सात सौ डोली, सहचरियों की भी लाऊं,
सज्जित हो डोली वीरों से, हर डोली में भरी कटारी हो,
गोरा बादल की निगरानी में, सोभित डारी डारी हो,
भू पाट पाट डोली पहुंची, बप्पा रावल की टोली पहुंची,
काट काट अरि धड़ को, जय काल कपाली बोली पहुंची,
बोली शोणित मय तलवारों की, बैरी दल को शोणित युक्त किया,
रावल गढ़ के रणधीरों ने, रावल पति को मुक्त किया,
तनन मनन हो बैरी बोला, झुलस झुलस कर मुख खोला,
अपमानी ज्वाला में जलता, तूफानी झोंको से बोला,
आरव तोपों से बोला, बरछी भालों की नोकों से बोला,
जन जन की लहु बहाने को, संगर की बैरी दल डोला,
बोला अरि लहुलुहान करो जग, ले हय गज उत्थान करो अब,
जन जन पर टूट पड़ो तुम, शोणित से स्नान करो अब।
🌿 Written by Rishabh Bhatt 🌿
✒️ Poet in Hindi | English | Urdu
💼 Engineer by profession, Author by passion
Author's Note
इस कविता के पीछे की एक छोटी-सी कहानी नमस्कार, आप सभी को मेरा सादर प्रणाम। ❤️
पिछले भाग में मैंने आपसे कहा था कि इस गाथा को लिखने की शुरुआत मेरे लिए केवल एक कोशिश थी। सच कहूँ तो जब मैंने इसका पहला भाग “चित्तौड़गढ़” पूरा किया, तो कुछ पल के लिए मुझे खुद यकीन नहीं हुआ कि ये मैंने लिखा है।
जिस एहसास और प्रेरणा से इसकी शुरुआत हुई थी, उसे शब्दों में उतार पाना मेरे लिए अपने आप में एक अनुभव था। इसलिए इस गाथा के लिए सबसे पहले मैं मनोज मुंतशिर सर और महाकवि श्यामनारायण पाण्डेय जी का हृदय से आभार व्यक्त करना चाहता हूँ।
इस गाथा की मूल प्रेरणा वही ‘जौहर’ की श्रृंखला है, जो मनोज मुंतशिर सर के चैनल पर चल रही थी। लेकिन इस दूसरे भाग को लिखते समय मैंने ‘पद्मावत’ फिल्म को भी एक प्रमुख reference के रूप में देखा और उसी से इस प्रसंग को अपने शब्दों और अपनी काव्य-शैली में ढालने की कोशिश की। आपमें से बहुतों ने शायद यह फिल्म देखी होगी, इसलिए इस भाग की कहानी से कुछ दृश्य आपको परिचित भी लग सकते हैं।
तो चलिए, अब पिछले भाग की उसी कहानी को आगे बढ़ाते हैं।
चित्तौड़ के रणधीरों की गर्जना ने खिलजी की सेना को यह एहसास करा दिया था कि इस दुर्ग को केवल शक्ति या संख्या के बल पर जीतना आसान नहीं होगा। चित्तौड़ का प्रत्येक योद्धा अपने गढ़ की रक्षा के लिए पर्वत की तरह अडिग खड़ा था। तलवारों की चमक और रणभूमि की हुंकार ने शत्रु के मन में भी भय पैदा कर दिया था।
लगातार संघर्ष के बाद खिलजी ने छल का मार्ग अपनाने का विचार किया। उसने युद्ध के स्थान पर मित्रता और अतिथि-सत्कार का बहाना बनाया और चित्तौड़गढ़ में आने की इच्छा प्रकट की। महाराज रतन सिंह ने भी अपनी संस्कृति और मर्यादा के अनुसार उसे अतिथि के रूप में स्वीकार किया। हमारे यहाँ “अतिथि देवो भवः” की परंपरा रही है, इसलिए शत्रु होते हुए भी अतिथि बनकर आए व्यक्ति के साथ मर्यादा रखी गई। लेकिन खिलजी की नीयत में सम्मान नहीं, छल छिपा था।
उसने महारानी पद्मिनी को देखने की इच्छा प्रकट की। यह माँग अपने आप में चित्तौड़ की मर्यादा के लिए एक बड़ी चुनौती थी, लेकिन महाराज ने अपनी संस्कृति और अतिथि-धर्म का पालन करते हुए उसे दंडित करने के बजाय जाने दिया। पद्मिनी की केवल एक झलक देखने के बाद भी खिलजी की इच्छा समाप्त नहीं हुई। उसके मन में अब एक और योजना जन्म ले चुकी थी।
वापस जाने से पहले उसने महाराज रतन सिंह को अपने साथ चलने के लिए आमंत्रित किया और अवसर पाकर छल से उन्हें बंदी बना लिया।
जब यह समाचार चित्तौड़ पहुँचा तो पूरा गढ़ व्याकुल हो उठा। महाराज अपने ही शत्रु के छल में बंदी थे और अब चित्तौड़ के सामने सबसे बड़ा प्रश्न था—उन्हें वापस कैसे लाया जाए?
तभी महारानी पद्मिनी ने स्वयं आगे बढ़ने का निर्णय लिया। उन्होंने खिलजी को संदेश भेजा कि महाराज की मुक्ति के बदले वो उसके दरबार में आने के लिए तैयार हैं। लेकिन वो अकेली नहीं आएँगी। उनके साथ सात सौ डोलियाँ और उनकी सहचरियाँ भी होंगी।
खिलजी ने इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। लेकिन उसे कहाँ पता था कि उन डोलियों में केवल सहचरियाँ नहीं, बल्कि चित्तौड़ के रणधीर अपने शस्त्रों के साथ छिपे हुए हैं।
महारानी पद्मिनी की योजना के अनुसार डोलियाँ खिलजी के शिविर की ओर बढ़ीं। ऊपर से वे सामान्य डोलियाँ दिखाई देती थीं, लेकिन भीतर चित्तौड़ के वीर योद्धा तलवार और कटार लेकर बैठे थे। गोरा और बादल की निगरानी में यह पूरा अभियान आगे बढ़ा।
और फिर वह क्षण आया, जब चित्तौड़ की डोलियाँ रणभूमि में बदल गईं। घूँघटों के पीछे छिपे रणधीर बाहर निकले। तलवारें चमकीं, कटारें निकलीं और खिलजी की सेना को संभलने तक का अवसर नहीं मिला। चारों ओर युद्ध की गर्जना गूँज उठी। इस महायुद्ध का उद्देश्य विजय पाना नहीं, अपने महाराज को मुक्त कराना था।
चित्तौड़ के वीरों ने अपना पराक्रम दिखाया और अंततः महाराज रतन सिंह को बंदीगृह से मुक्त करा लिया। अपने राजा को साथ लेकर वे चित्तौड़ लौट आए। लेकिन इस घटना ने खिलजी के अभिमान को गहरी चोट पहुँचाई। जिस योजना से वह चित्तौड़ के महाराज को अपने कब्जे में लेकर अपनी विजय समझ रहा था, वही योजना उसके लिए अपमान का कारण बन गई। क्रोध और अपमान से भरे खिलजी ने अब चित्तौड़ पर और भी बड़े आक्रमण का आदेश दिया।
और यहीं से कहानी एक और भयंकर मोड़ लेती है। क्योंकि अब सामने केवल एक दुर्ग नहीं था— सामने था चित्तौड़ का स्वाभिमान। और उस स्वाभिमान की रक्षा के लिए एक बार फिर तैयार थे—रावल गढ़ के रणधीर।
अब आगे की कहानी में युद्ध और भी विकराल होगा, चित्तौड़ की धरती पर रक्त बहेगा और इतिहास उस दिशा में बढ़ेगा, जहाँ से लौटना किसी के लिए संभव नहीं होगा।
आप इस दूसरे भाग को पढ़कर अपना एहसास Comment में ज़रूर बताइए। अगर आपको यह गाथा पसंद आ रही है, तो इसे अपने दोस्तों तक Share भी कीजिए। ऐसी ही रचनाओं, कहानियों और एहसासों के लिए RishNova से जुड़े रहिए। ❤️
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Very nice historical poem
ReplyDeleteThis poem say many things about rani padmavati nice paem👌🤟
ReplyDeleteI know many things about padmavati by this poem good poem
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