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Preyasi
"प्रेम, विरह, सौंदर्य और वेदना से गुज़रती हिंदी कविताओं का एक ख़ूबसूरत सफ़र।"
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August 2026
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Season 1
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“रश्मिरथी” से शुरू करना शायद इस series के लिए सबसे सही होगा।
हिंदी की ऐसी रचनाएँ बहुत कम हैं, जिन्हें जितनी बार पढ़ो, हर बार उनमें से कोई नया अर्थ, कोई नया भाव और कोई नया अनुभव निकलकर सामने आए। रश्मिरथी मेरे लिए ऐसी ही रचना रही है। मैंने इसे जितनी बार पढ़ा है, हर बार इसके साथ एक अलग तरह का रिश्ता बना है। ख़ासकर इसका सर्ग–3।
इसी तरह एक दिन मैं रामधारी सिंह ‘दिनकर’ जी की “उर्वशी” पढ़ रहा था। वो रचना भी मुझे बेहद ख़ूबसूरत लगी। शायद उसी समय हिंदी कविता को देखने का मेरा नज़रिया थोड़ा बदलने लगा।
इन दोनों रचनाओं को पढ़ते-पढ़ते मुझे हिंदी कविता से जैसे प्रेम हो गया। फिर उन्हीं रचनाओं से प्रेरणा लेकर मैंने “महारानी पद्मिनी की जौहर गाथा” और “सिंधपति दाहिर” जैसे खंडकाव्य लिखे। इतिहास, वीरता और संघर्ष को तो शब्द मिल गए थे, लेकिन मेरे भीतर एक और तलाश चल रही थी— प्रेम की।
मैं प्रेम को तलाश रहा था। उस प्रेम को, जो सिर्फ़ ख़ुशी नहीं है। जो कभी मिलन है, कभी विरह है, कभी प्रतीक्षा है और कभी किसी को खो देने के बाद बची हुई ख़ामोशी। और फिर एक दिन रामानंद सागर जी की रामायण का एक गाना सुना— “प्रेयसी, दो अंतिम बार विदा…”
मेघनाद और सुलोचना की आख़िरी विदाई पर लिखा गया वो गाना मुझे दिल तक छू गया। उसमें प्रेम था, विरह था, मृत्यु की आहट थी और उस प्रेम की बेबसी भी, जो अपने सबसे क़रीबी इंसान को जाते हुए सिर्फ़ देख सकता है। गाने के शब्दों में जो ख़ूबसूरती थी, उसने मुझमें कुछ छोड़ दिया। और शायद वहीं से इस series को उसका नाम मिला— “प्रेयसी”
इस series की पहली कविता “रूपसी” है, जिसे मैंने “उर्वशी” पढ़ने के बाद लिखा था। शायद अगर “उर्वशी” से मेरी वह मुलाक़ात न हुई होती, तो “रूपसी” भी शायद कभी जन्म न लेती।
इसके बाद आई “ढोल तू बजना घड़ी भर”, जो धर्मवीर भारती जी की “डोला” से प्रेरित थी। और फिर उसके बाद की कविताएँ… उनमें कोई तय योजना नहीं थी।
बस दिल था। कुछ एहसास थे। कुछ प्रेम था। और बहुत-सी ऐसी बातें थीं, जिन्हें कहने के लिए कोई सामने नहीं था। इसलिए मैंने उन्हें लिखना शुरू कर दिया। शुरुआत में वे कविताएँ भी नहीं थीं। वे मेरी डायरी थीं। जहाँ मैं अपनी वेदना लिखता था, अपना प्रेम लिखता था, अपनी उलझनें रखता था और कभी-कभी उन भावनाओं को भी शब्द दे देता था, जिन्हें शायद मैं ख़ुद भी ठीक से समझ नहीं पाता था।
समय बीतता गया और वही बिखरे हुए पन्ने, वही निजी एहसास और वही अधूरे संवाद धीरे-धीरे एक साथ आते गए। और फिर मुझे लगा— ये सिर्फ़ मेरी डायरी नहीं रही। ये “प्रेयसी” बन चुकी है। इसलिए इस series को पढ़ते हुए अगर आपको कहीं कविता दिखाई दे और कहीं किसी की निजी डायरी का पन्ना महसूस हो, तो शायद आप सही महसूस कर रहे होंगे।
शायद इसी वजह से इस series की हर कविता एक जैसी नहीं है। लेकिन उन सबके बीच एक चीज़ हमेशा एक रही— प्रेम को समझने की कोशिश।
तो अगर “प्रेयसी” की कोई कविता आपको किसी पुराने एहसास तक ले जाए, किसी चेहरे की याद दिलाए या आपको अपने भीतर छिपे किसी प्रेम से मिला दे, तो comment में अपनी बात ज़रूर बताइए।
और अगर आपको लगे कि ये अल्फ़ाज़ किसी ऐसे व्यक्ति तक पहुँचने चाहिए, जिसके लिए ये मायने रखते हैं, तो उन्हें share भी कीजिए। ❤️
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