प्रेयसी : Season–1
रुपसी 🪷
वो विस्तृत गगन की चांदनी,
महि पर चली पग डोल कर,
बंकिम नयन के बाण से
वो भेदती मधु बोल कर,
है बांधती हर सांस को,
बिखरे अलक के जाल,
नौका बनी सी बह चली,
बहते सरित की धार में,
वो प्रेम की बहती पवन,
रहती समय के साथ में,
ये ओस की बूंदें छूएं जो,
हीरकों बने उस हाथ में,
श्रृंगार सा मुस्कान में,
करती ऊषा रंगीन हैं,
वो तितलीयों के रंग में,
जैसे सरित में मीन है।
🌿 Written by Rishabh Bhatt 🌿
✒️ Poet in Hindi | English | Urdu
💼 Engineer by profession, Author by passion
Follow Author
Download PDF
