Utar Jao Sadkon Pe 🩸 : For the Victims – Rishabh Bhatt | Cheekh

हर 20 मिनट में एक नया मामला... सवाल है, अगला नाम किसका होगा?

CHEEKH S1

Unfiltered. Unapologetic. Real.

उतर जाओ सड़कों पे

मुरझाई एक फूल को तुम देख लो यारों, अब भी वक्त है फूलों को सम्हालों, महक न रह जायेगी दुनिया में, अगर इक फूल और मुरझाया, यूं हैवानियत ने इंसानियत का सिर झुकाया, उतर जाओ सड़कों पे कि फिर उतरना न हो, इंसाफ़ की ये लड़ाई किसी मासूम को लड़ना न हों। तड़पती रूह से एक आवाज आई है, किसी के जिस्म पर किसी की ज़िद समाई है, अब आक्रोश अगर बुझ गया, तो कल फिर मोमबत्तियां जलानी पड़ेंगी, मंज़िल से पहले रुके जो क़दम, तो कीमत किसी और को चुकानी पड़ेगी, उतर जाओ सड़कों पे कि फिर उतरना न हो, दरिंदगी की आग में फिर किसी मासूम का जलना न हो। मना लो राखियां भर भर कलाई को, मगर क्या बहन को आज़ाद सांसे दे सके हो? किंतु अमर्यादित समाज में, एक लीक आज लिख सकते हो, कि हमारे एक व्यवहार से, दुश्वार किसी लड़की का चलना न हो, क़दमों के छोड़े छाप पर, पछतावे में हाथ मलना न हो, उतर जाओ सड़कों पे कि फिर उतरना न हो, खिलने से पहले किसी फूल को डरना न हों। 🌿 Written by Rishabh Bhatt 🌿 ✒️ Poet in Hindi | English | Urdu 💼 Engineer by profession, Author by passion

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Author's Note

कुछ बातें, जो कहना ज़रूरी लगा
नमस्कार! मेरे प्यारे दोस्तों, ये कविता मैंने 2024 में लिखी थी, जब कोलकाता में एक युवा डॉक्टर के साथ हुई रेप और हत्या की घटना ने पूरे देश को हिला दिया था। उस समय हर तरफ गुस्सा था, लोग इंसाफ़ की मांग कर रहे थे, लेकिन मेरे मन में एक सवाल बार-बार आ रहा था—क्या हम हर बार किसी घटना के बाद ही जागेंगे? दो साल बाद, 2026 में यह नोट लिखते हुए दुख होता है कि हालात पूरी तरह बदले नहीं हैं। आज भी आए दिन ऐसी खबरें सामने आ जाती हैं। हर घटना के बाद कुछ दिनों तक गुस्सा दिखता है, मोमबत्तियाँ जलती हैं, सोशल मीडिया पर पोस्ट लिखी जाती हैं, फिर सब सामान्य हो जाता है। केवल उस परिवार की ज़िंदगी कभी सामान्य नहीं होती जिसने अपना कोई खोया होता है। कुछ दिन पहले मैंने "अस्सी" मूवी देखी। इस मूवी की सबसे ज़्यादा असर करने वाली बात इसका 20 मिनट का काउंटडाउन है। हर 20 मिनट बाद स्क्रीन पर समय खत्म होता दिखाया जाता है। इसका मतलब यह है कि औसतन हर 20 मिनट में देश में एक रेप का मामला दर्ज होता है। फिल्म आँकड़ों को सिर्फ नंबर की तरह नहीं दिखाती, बल्कि समय के रूप में महसूस कराती है। जब बार-बार 20 मिनट बीतते दिखाई देते हैं, तो एहसास होता है कि जब तक हम एक काम पूरा करते हैं, तब तक कहीं न कहीं एक और लड़की न्याय की लड़ाई में धकेल दी जाती है। जब सड़क पर चलती किसी लड़की को देखकर नज़रें बदल जाती हैं... जब अश्लील टिप्पणी को "मज़ाक" कहकर टाल दिया जाता है... जब किसी लड़की के कपड़ों, समय या व्यवहार पर सवाल उठाए जाते हैं... और जब गलत देखकर भी लोग चुप रह जाते हैं... तब अपराध केवल अपराधी नहीं करता, हमारी चुप्पी भी उसका साथ देती है। राखी के दिन बहन की कलाई पर धागा बाँध देना आसान है। कठिन यह है कि ऐसा समाज बनाया जाए जहाँ उसे आपकी सुरक्षा की नहीं, अपने अधिकारों की आज़ादी मिले। अपनी माँ के लिए सम्मान की बातें करना आसान है, लेकिन क्या वही सम्मान हर उस स्त्री को मिलता है जो आपके घर की नहीं है? ज़रा एक पल रुककर सोचिए... अगर अगली खबर में पीड़िता का नाम आपकी बहन होता... अगर वह आपकी माँ होती... अगर वह आपकी बेटी होती... क्या तब भी हम यही कहते कि "ये तो रोज़ होता है"? मेरा मानना है कि बदलाव सिर्फ कानून से नहीं आएगा। बदलाव तब आएगा, जब लड़कों को बचपन से सम्मान सिखाया जाएगा, जब किसी लड़की को देखकर नज़र नहीं, नज़रिया बदलेगा, और जब गलत के सामने चुप रहने के बजाय आवाज़ उठाना सामान्य बात होगी। अगर इस कविता को पढ़कर एक भी इंसान अपने व्यवहार, अपनी सोच या अपनी ज़िम्मेदारी पर दो मिनट के लिए भी सोचता है, तो मुझे लगेगा कि इसे लिखना बेकार नहीं गया। — ऋषभ भट्ट & RishNova Team •💬 अगर आपको यह कविता अच्छा लगा हो, तो नीचे कमेंट में अपनी राय जरूर बताइए। •📲 इसे अपने दोस्तों और परिवार के साथ भी शेयर कीजिए। •📚 ऐसी ही कविताएँ, कहानियाँ और ब्लॉग पढ़ने के लिए हमारी वेबसाइट से जुड़े रहिए। ✨ •🌸 आपके स्नेह के लिए धन्यवाद — Team RishNova
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