Brassband Wala 🎺 – Rishabh Bhatt | Cheekh

तमाशा खत्म, इंसानियत शर्मसार! एक बेबस ब्राशबैंड वाले के स्वाभिमान पर समाज का सीधा प्रहार

CHEEKH S1

Unfiltered. Unapologetic. Real.

ब्रासबैंड वाला 🎺

धुन को मैं धारण करता, धन की कुछ आश लिए, घूंट–घूंट बूंदों को पी कर, परम ताप में सांस जिए। पग सिर की सोभा यह, कनक मणि है वस्त्र यही, ढोल नगाड़ों की गूंजें सुनना, यही उदय है अस्त यही। पितृ समान आयु थी जिसकी, उसकी पगड़ी पैर तले, मदिरा के आदी कुछ उतपाती, बन बैरी वो गैर चलें। पकड़ कांध को झपटे वे, हाथों को भी तान पड़े, खेल बना या बना खिलौना, मुझको न कुछ जान पड़े। खींच–खींच इन हाथों को, लट्टू से वे नाच नचाएं, मनोरंजन का छवि उभरा, मस्त मगन हो सब मुस्काएं। रंग बिरंगी उड़ी तरंगें, कौतूहल मन में छाया, रंग मंच से फेंका सबने, भू ने अपने गले लगाया। पर शायद नया न कुछ इसमें, वर्षों से यह हाल मिले, सहन शक्ति की सीमा में इस, दो पहर की रोटी दाल मिले। स्वीकार मुझे तिनके सा भी, मुझको न कोई मान मिले, दो टूक कलेजे का कर यदि, गृह के मुख मुस्कान मिले। 🌿 Written by Rishabh Bhatt 🌿 ✒️ Poet in Hindi | English | Urdu 💼 Engineer by profession, Author by passion

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Author's Note

कुछ बातें, जो कहना ज़रूरी लगा
नमस्कार! मेरे प्यारे दोस्तों, यह कविता मैंने नवंबर 2021 में लिखी थी। उस दिन मैं कानपुर की एक बारात में था। चारों तरफ़ डीजे, डांस और जश्न का माहौल था। लेकिन उसी भीड़ में एक ऐसा दृश्य देखा, जो आज भी याद है। एक उम्रदराज़ ब्रासबैंड वाला अपना काम कर रहा था। वह बस अपनी धुन बजा रहा था। तभी कुछ शराब के नशे में लोग उसके साथ बदसलूकी करने लगे। कोई उसकी पगड़ी खींच रहा था, कोई उसे ज़बरदस्ती नचा रहा था, कोई उसका मज़ाक उड़ा रहा था। सबसे ज़्यादा तकलीफ़ इस बात की हुई कि वह कुछ बोल भी नहीं रहा था। शायद इसलिए क्योंकि उसे पता था कि अगर उसने विरोध किया, तो उस रात उसकी कमाई चली जाएगी। घर जाकर मैंने यही कविता लिखी। जब इसे दोबारा पढ़ता हूँ, तो लगता है कि उस दिन मैंने सिर्फ़ एक ब्रासबैंड वाले को नहीं देखा था। मैंने उन लाखों लोगों को देखा था, जो हर दिन हमारा काम आसान बनाते हैं, लेकिन बदले में उन्हें सम्मान नहीं मिलता। कभी कोई वेटर सबके सामने डाँट खाता है। कभी किसी सफ़ाई कर्मचारी को इंसान समझा ही नहीं जाता। कभी किसी रिक्शा वाले से ऐसे बात की जाती है, जैसे उसकी कोई इज़्ज़त ही न हो। और कई बार लोग इसे मज़ाक समझकर हँस भी देते हैं। हम अक्सर कहते हैं कि "कोई काम छोटा नहीं होता।" लेकिन सच यह है कि आज भी बहुत से लोग काम देखकर इंसान की इज़्ज़त तय करते हैं। जितना छोटा काम, उतना छोटा व्यवहार। इस कविता का नाम "ब्रासबैंड वाला" है, लेकिन यह सिर्फ़ एक ब्रासबैंड वाले की कहानी नहीं है। यह हर उस इंसान की कहानी है, जो अपनी बेइज़्ज़ती सहकर भी काम करता है, क्योंकि उसके घर में कोई उसका इंतज़ार कर रहा होता है। मुझे आज उस आदमी का चेहरा याद नहीं है। लेकिन उसकी ख़ामोशी याद है। शायद इसलिए कि उस दिन शोर सबसे ज़्यादा था... और सबसे ज़्यादा चुप भी वही इंसान था। — ऋषभ भट्ट & RishNova Team •💬 अगर आपको यह कविता अच्छा लगा हो, तो नीचे कमेंट में अपनी राय जरूर बताइए। •📲 इसे अपने दोस्तों और परिवार के साथ भी शेयर कीजिए। •📚 ऐसी ही कविताएँ, कहानियाँ और ब्लॉग पढ़ने के लिए हमारी वेबसाइट से जुड़े रहिए। ✨ •🌸 आपके स्नेह के लिए धन्यवाद — Team RishNova
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