दिव्य भक्ति संग्रह
Siya Ram Specialमर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम 🏹
तेज धर्म मूर्ति के आभा अर्क समान,
मर्यादित पुरुषार्थ से है त्रिलोक ये प्रकाशमान,
न समान पंचतत्व में कोई रघुवर सा नाम,
सृष्टि के सृजनकर्ता, जय रघुनंदन श्री राम।
ये मन भर हर्ष से खिले, रजनी में आश मिले,
जीवन में जो तेरे चरणों की धूल मिले,
शरणों में ये तन करता रहे वन्दन,
जय रघुपति राघव दशरथनन्दन।
हैं गुण ज्ञान कोश मन भावन पावन चरित्र,
धर्म, कर्म के स्तम्भ करें गुणगान गंगा पवित्र,
गुणगान करें सुर, नर, मुनि, जन,
भजता रहे ये मन जय रघुकुल भूषण राजीव नयन।
चला जा रहा सुन जिस गाथा को अविरल,
अज्ञेय बसा क्या उसमें जो नव्य लगे हर पल,
आदर्श भरे जीवन में दे जीवन को संबल,
निर्मल करता तन, मन जय सियापति रघुनंदन।
🌿 Written by Rishabh Bhatt 🌿
✒️ Poet in Hindi | English | Urdu
💼 Engineer by profession, Author by passion
Author's Note
इस कविता के पीछे की एक छोटी-सी कहानी अगर आप RishNova को काफी समय से पढ़ते आ रहे हैं, तो शायद आपको यह जानकर थोड़ा अजीब लगे कि जिस जगह पर आज मैं अपनी लिखी हुई बातें आप तक पहुँचाने की कोशिश करता हूँ, उसकी शुरुआत मुझे खुद ठीक से करना भी नहीं आता था। यह कविता RishNova पर प्रकाशित होने वाली मेरी पहली कविता थी।
उस समय की बात है जब मुझे blogging के बारे में सच कहूँ तो कुछ भी नहीं पता था। मेरे पास बस मेरी लिखी हुई करीब 40–50 कविताएँ थीं। मैं लिखता था और लिखकर रख देता था। कभी डायरी में, कभी फोन में, कभी किसी file में। मन में एक इच्छा जरूर थी कि जो कुछ मैं लिखता हूँ, उसे कभी लोगों तक भी पहुँचाऊँ। लेकिन सवाल यही था कि कैसे?
Blog क्या होता है, उसे कैसे चलाते हैं, लोग मेरी कविताएँ पढ़ेंगे भी या नहीं, उन्हें यहाँ तक लाया कैसे जाएगा—इन सबका मुझे कोई खास idea नहीं था। फिर 17 October 2021 को मैंने शायद सबसे आसान काम किया। बस ये कविता उठाई और अपने new blog पर publish कर दी।
न कोई बड़ी planning थी, न कोई strategy। बस लगा कि कविता लिखी है, तो इसे यहाँ डाल देते हैं। आज जब पीछे मुड़कर उस दिन को देखता हूँ, तो लगता है कि कई बार हमें शुरुआत करने के लिए पूरी तरह तैयार होने की जरूरत नहीं होती। बस पहला कदम उठाना होता है। बाकी चीजें रास्ते में सीखते-सीखते आती हैं।
इस कविता के साथ भी मेरी कहानी कुछ ऐसी ही है। कई बार सोचा कि इस कविता के बारे में आपसे थोड़ा विस्तार से बात करूँ। बताऊँ कि इसे लिखते समय मेरे मन में क्या था, इसकी पंक्तियों में मैं क्या कहना चाहता था। लेकिन कभी समय नहीं मिला, कभी लगा कि बाद में करेंगे और फिर वह “बाद में” आता ही नहीं था।
लेकिन अब जब RishNova एक नई theme और नए रूप में आपके सामने है, तो लगा कि इससे अच्छा मौका शायद फिर न मिले। पुराने blogs को update करने का एक बहाना भी मिल गया और इस कविता के साथ थोड़ी देर बैठने का भी। तो आज मैं इसे सिर्फ एक कविता की तरह नहीं, बल्कि अपनी उस शुरुआती journey की तरह देख रहा हूँ।
यहाँ एक छोटी-सी बात पहले बता दूँ—आगे कविता को समझाते हुए मैं “कवि” शब्द का इस्तेमाल अपने लिए कर रहा हूँ। यानी जब मैं लिखूँगा “कवि कहता है” या “कवि का आशय है”, तो यहाँ कवि कोई और नहीं, मैं स्वयं हूँ।
कवि कहता है कि श्रीराम धर्म, मर्यादा और पुरुषार्थ की ऐसी मूर्ति हैं, जिनका जीवन स्वयं प्रकाश की तरह है। उनके चरित्र में ऐसा तेज और आदर्श है, जो हमें भी जीवन में सही राह पर चलने की प्रेरणा देता है।
फिर कवि की बात थोड़ी अपनी हो जाती है। वह चाहता है कि श्रीराम का स्मरण उसके मन को प्रसन्न रखे, जीवन को सही आधार मिले और उसका तन-मन प्रभु की शरण में बना रहे।
आगे कवि श्रीराम के गुण, ज्ञान और पावन चरित्र का गुणगान करता है। उनके जीवन में धर्म और कर्म के जो आदर्श हैं, वही उन्हें विशेष बनाते हैं। इसलिए मन बार-बार उन्हीं का स्मरण करना चाहता है।
अंत में कवि कहता है कि श्रीराम की गाथा जितनी बार सुनी जाए, हर बार उसमें कुछ नया महसूस होता है। उनका जीवन हमें भक्ति के साथ-साथ कठिन समय में संबल और अपने जीवन को बेहतर बनाने की प्रेरणा भी देता है।
यही इस कविता का मेरा सरल-सा भाव है—श्रीराम को याद करना, उनके आदर्शों को समझना और कोशिश करना कि उनके जीवन की थोड़ी-सी मर्यादा हमारे जीवन में भी उतर सके। कविता आपको कैसी लगी, comment में जरूर बताइए और पसंद आए तो share कीजिए। ऐसी ही रचनाओं के लिए RishNova के साथ जुड़े रहिए। जय श्री राम। 🙏
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Very very nice
ReplyDeleteThank you
DeleteGood poem 👌👌
ReplyDeleteThank you
Deletevery very nice poetry 😗
ReplyDeleteJai Shree Ram🙏🙏🙏🙏🙏🙏
ReplyDeleteRam ram jai shree ram
ReplyDeleteVery nice poetry
ReplyDeleteBeautiful poem
ReplyDeleteJhakas
ReplyDeleteBahut sundar
ReplyDeleteJai Shree Ram
ReplyDeleteJai jai shree ram
ReplyDeleteBahut mast
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