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Manthan
"मन, विचार और इच्छाओं के बीच ख़ुद को समझने की कोशिश। मंथन — एक ऐसा सफ़र, जहाँ हर जवाब आपको खुद के थोड़ा और क़रीब ले आएगा।"
02
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August 2026
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हमारी भारतीय दर्शन-परंपरा में आत्मखोज को हमेशा एक महत्वपूर्ण स्थान मिला है। वेदों, उपनिषदों, पुराणों और हमारी प्राचीन ज्ञान-परंपराओं में मनुष्य को बार-बार अपने भीतर देखने, अपने मन को समझने और स्वयं से प्रश्न करने की ओर ले जाया गया है। शायद इसी दर्शन ने मुझे भी पहली बार ये सोचने का रास्ता दिया कि जिन सवालों के जवाब मैं बाहर ढूँढ़ रहा हूँ, उनमें से कुछ के जवाब मेरे अंदर भी हो सकते हैं।
फिर मैंने ख़ुद से बातें करना शुरू किया। अपने डर से, अपनी कमज़ोरियों से, अपने ग़ुस्से से, अपनी इच्छाओं से… और उस इंसान से भी, जिसे दुनिया के सामने मैं शायद ठीक से पहचानता था, लेकिन ख़ुद के सामने अब तक नहीं।
उन बातचीतों में जो मिला, जो समझ आया, जो सवाल बचे और जिन जवाबों ने मुझे थोड़ा-सा बदला—उन्हीं सबको मैंने अपनी तरह से शब्द देने की कोशिश की है। यही “मंथन” है।
इस series में आपको आत्मखोज मिलेगी, अपने अंदर की शक्ति को पहचानने की कोशिश मिलेगी, मन और इच्छाओं के बीच का संघर्ष मिलेगा, आत्मसंयम की बातें मिलेंगी और शायद कुछ ऐसे सवाल भी, जिनसे हम रोज़ गुज़रते हैं लेकिन ख़ुद से पूछने से बचते हैं।
ये series मुझे इसलिए भी बेहद ख़ास है क्योंकि मेरी पहली लिखी हुई कविता— “समय आ गया है परिवर्तन का”—इसी series का हिस्सा है। मेरी दूसरी कविता, चौथी कविता और मेरी कई शुरुआती रचनाएँ भी यहीं से निकलीं। यानी अगर आज मैं लिखता हूँ, तो मेरी writing की पहली साँसों में “मंथन” कहीं न कहीं मौजूद रहा है। उस वक़्त मुझे शायद ख़ुद भी नहीं पता था कि मैं क्या लिख रहा हूँ। बस भीतर कुछ था, जिसे बाहर आना था। शायद इसी वजह से “मंथन” मेरे लिए बाकी series से थोड़ा अलग है।
हम कौन हैं? हम जो चाहते हैं, वो सच में हमारा है या बस हमें चाहिए? हम अपने मन को चला रहे हैं या हमारा मन हमें चला रहा है? हमारी सबसे बड़ी ताक़त क्या है—और हमारी सबसे बड़ी कमज़ोरी?
इन सवालों के जवाब मैं कोई अंतिम सत्य बनाकर आपके सामने नहीं रखता। मैं बस अपने भीतर उतरकर जो देख पाया, उसे आपके सामने रख रहा हूँ। हो सकता है, इनमें से कुछ बातें आपको बिल्कुल अपनी लगें। हो सकता है, कोई कविता आपको असहज करे। और शायद कोई पंक्ति ऐसी भी हो, जिसके सामने आप कुछ देर ख़ामोश होकर अपने बारे में सोचने लगें। अगर ऐसा हुआ, तो शायद “मंथन” अपने मक़सद तक पहुँच गया।
तो आइए, इस बार बाहर की दुनिया को थोड़ी देर के लिए किनारे रखते हैं। अपने अंदर झाँकते हैं। कुछ सवाल करते हैं। कुछ जवाब तलाशते हैं। और शायद इस मंथन में अपने ही अंदर छिपी किसी ऐसी शक्ति से मिलते हैं, जिसे हम लंबे समय से पहचान नहीं पाए।
क्योंकि सबसे ज़रूरी मुलाक़ात वही है, जो इंसान की ख़ुद से होती है। ✨
अगर इस series की कोई कविता आपको अपने भीतर झाँकने पर मजबूर करे, तो comment में अपनी बात ज़रूर बताइए। और अगर आपको लगे कि ये शब्द किसी ऐसे व्यक्ति तक पहुँचने चाहिए, जिसे इनकी ज़रूरत है, तो उन्हें share भी कीजिए।
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Har playlist, ek alag ehsaas.